काँपी थी रूह सहमा था दिल, लगा उस पल मर जायेंगे तेरे बिन,
बरसो बीते कल की बात, इस दर्द में जीने की आदत सी हो गई
जानते हैं हो जुदा तुमसे, मौत से बदतर जी है यह ज़िन्दगी हमने,
जाने क्यों मर कर भी मर ना पाए, पल पल घुटती साँसे जी है हमने
माँगा था साथ दुआओं में, मिला तनहाइयों का पैगाम रुसवाईओं में,
रास आ ही गया रूह को मेरी, यूँ घुट घुट कर जीना इन तन्हाइयों में...