आज जिंदगी के इस पड़ाव पर
समझ आई ये बात
मेरा परिवार ही मेरी दुनिया हैं
ये मेरी गलतफहमी थी तब
सबकी अपनी अपनी दुनिया है अब
किसी को मेरी जरुरत नहीं
फिर भी आज जिन्दा हूँ
अवांछित अनुपयोगी
कहाँ जाऊं क्या करूँ
शायद जिसकी जरुरत यहाँ नहीं
ऊपर वाले के यहाँ भी नहीं