शीर्षक - तुम ही तो हो
तुम सच बताओगी क्या,
मुझे दिल से लगाओगी क्या?
तुम बड़ी प्यारी सी दिखती हो,
दिल पर वार के लिए खंजर भी लेकर घूमती हो..?
पूछो तो सिर्फ अपना लहजा बदलती हो,
सच कहने से तुम घबराती हो..?
तुम सच-सच बताओ,
क्या तुम आज भी मुझसे इश्क करती हो क्या...
तुम मुझ पर नजर रखती हो,
किसी को हँसता देख, खुद को पागल बना,
तुम मुझे ऐसा करने से रोकती हो...?
तुमसे भी ज्यादा तुम्हें मुझसे इश्क है,
मैं तुम्हें कविताओं के सहारे कहता हूँ,
तुम खुद को क्यों नहीं समझती हो..
मैं जानता हूँ,
तुम मुझे अपनी जिंदगी का हिस्सा समझती हो...
तुम समाज-परिवार से सिर्फ डरती हो..
तुम सारा मुझ पर हक भी जमाती हो,
मैं बारीकी से समझता हूँ,
मगर मैं क्या करूँ...
मैं तो बस तुमसे सुनना चाहता हूँ...
एस. टी. डी. मौर्य ✍️