मैं पत्थर हूँ
मैं पत्थर हूँ,
नग हूँ,
बदलता नहीं...
रोता मैं बहुत हूँ,
मुझ पर लकीर बन जाए,
मगर मैं मिटाता नहीं हूँ...
अपने आँसुओं को भी
खूबसूरत झरने का रूप देता हूँ...
कोई दुखी न हो मेरे लिए,
मैं सबको शीतल पवन देता हूँ...
मेघा की दिशा बदलकर,
मेघा के आंसुओं से
हर तरफ सुंदर रूप दे देता हूँ...
नदियों को अपने आंसुओं से भर देता हूँ,
हर तरफ बिखेर देता हूँ...
मेरी चाहत होती है—
कड़क समुद्र भी मीठा बन जाए,
इसलिए अपने आंसुओं का मिश्रण कर देता हूँ...
मैं पत्थर हूँ,
नग हूँ,
मैं बदलता नहीं...
अपने आंसुओं को खूबसूरती में बदल देता हूँ...
— एसटीडी मौर्य ✍️