शीर्षक — पुरानी ही हरकत
वह पल भी क्या था,
वर्षों पुरानी याद थी।
बिछड़े लोगों से मुलाकात थी।
एक पुराने दोस्त का जन्मदिन था।
काश! दोस्ती के उन पलों की पहचान थी।
हम सब एक-दूसरे से दूर न चले जाएँ,
इसलिए उसके अपने जन्मदिन को
यादगार बनाने की चाह थी।
कुछ पल यूँ ही बीत गए,
समय भी कम था।
मैं लौट रहा था घर,
मगर दोस्ती की सौगात देने,
वह रोक रही थी।
उसने बोला, इतना प्यार से खिला रही हूँ,
फिर क्यों नहीं चलकर खा रहे?
मेरी नटखट-सी हरकत बोल दिया मैं—
क्या तुम अपने हाथों से खिला रही हो,
जो इतना प्यार से खिलाने की बात कर रही हो?
उसने दिल पर ले ली बात,
फिर दोस्ती की सौगात में
अपने हाथों से खिलाई।
मैंने मना किया, फिर वह न मानी।
लोग देख रहे थे।
मन ही मन मैं कुछ सोच रहा था,
उनकी ऐसी हरकत देखकर
मन ही मन हँस रहा था।
इतना ही नहीं,
ज़हर की पुड़िया खाने-खिलाने की बात हो रही थी।
होंठों पर मुस्कान रख,
सब मुँह छुपा-छुपाकर हँस रही थीं।
कोई पगली थी, कोई नटखट थी,
यही दोस्ती की पहचान थी।
सुबह से इंतज़ार कर मेरा,
कुछ पल चूक जाती,
तो मैं घर आ जाता।
पता नहीं, उनमें से कौन दुआ करके माँग रहा था।
कॉलेज से निकलने ही वाला था
कि तभी मुझे रुकने की खबर आई।
कुछ भी नया न था,
वही पुरानी आदत थी...
— एस.टी.डी. मौर्य ✍️