समाज को साधारणीकरण के फार्मुले से सोचने की आदत है. सारे मर्द ख़राब हैं, सारी औरतें पीड़ित हैं. जैसी बातें विमर्श को आसान बना देती हैं. लेकिन हर इंसान नारों के जैसा स्याह और सफेद नहीं है. न ही हर आदमी किसी एक फ़ार्मूले पर फ़िट किया जा सकता है. यहाँ रेप करने वाले मर्द हैं तो अपनी जान पर खेलकर सैकड़ों यात्रियों की जान बचाने वाले स्मित मच्छार जैसे मर्द भी हैं..जिनको देखकर भरोसा किया जा सकता है कि कुछ मर्द अभी भी भरोसे के क़ाबिल है.