अपने को बिना मिटाए
परमात्मा नहीं मिलता।
उतनी कीमत चुकानी
ही पड़ती है। और कोई
कीमत बड़ी नहीं है।
हम अपने को देकर
परमात्मा को पाते हैं,
इसमें हम कीमत ही क्या
चुकाते हैं।
हमारा मूल्य ही क्या है !
हमारा कोई मूल्य नहीं है।
दो कौडी के बदले
हम कोहिनूर पाते हैं