जीवन में चाहे आप कितना भी आगे बढ़ जाए कितनी भी शोहरत पा ले कितने भी सफल हो जाए लेकिन बचपन जैसी मासूमियत और निश्चलता दोबारा लौटकर कभी वापस नहीं आती वह खिलौने के लिए जिद करना छोटी-छोटी बातों पर लड़ना और फिर मान जाना अपनी कल्पनाओं के संसार को सच मान लेना शायद बचपन इसीलिए इतना निर्दोष होता है क्योंकि उसे असली दुनिया की कोई चिंता या फिर समझ ही नहीं होती क्योंकि एक बार वह समझ आने के बाद तो हम ऐसी कंपटीशन का हिस्सा बन जाते हैं जहां पढ़ाई लिखाई भविष्य करियर सब कुछ बस एक दौड़ है एक बार पढ़ाई पूरी हो गई फिर परिवार की जिम्मेवारिया संभालो और जो यह सब नहीं कर पाता वह खुद को पिछड़ा हुआ समझने लगता है लेकिन बचपन इस सबसे अलग होता है वहां कोई कंपटीशन नहीं होता बस मासूमियत होती है हां आजकल के समय में शायद बच्चों की वह मासूमियत भी कहीं खो सी गई है लेकिन फिर भी अगर जीवन में सबसे निश्चिंत रहने का कोई समय है तो वह बचपन ही है बाकी पूरा जीवन तो आप एक ऐसे दौड़ में लगे होते हैं जिसका कोई अंत ही नहीं होता इसीलिए अगर दोबारा बच्चे बनने का मौका मिले तो शायद हर कोई दोबारा बच्चा बनना ही चुनेगा इस बनावटी और टेंशन भरी दुनिया से दूर जाने के लिए पर अफ़सोस है कि जिंदगी कभी किसी को भी दोबारा ऐसा कोई मौका नहीं देती और सबसे हैरानी की बात तो यह है कि जब हम बच्चे होते हैं तो हमारा मन करता है कि हम जल्दी से बड़े हो जाएं लेकिन बड़े होने के बाद हमसे कितना कुछ छिन जाएगा इसका एहसास हमें नहीं होता