Hindi Quote in Poem by sachit karmi

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हिंदी, मेरा सच और नया सवेरा

हाँ, मैं हिंदी से मुख मोड़ता हूँ,
किसी और कारण नहीं, मैं खुद ही दोषी हूँ।
अपनी समझ और ज्ञान के बजाय,
दिखावे और 'अंग्रेजी' को महत्व देता हूँ।

अपनी विरासत पर गर्व करने के बजाय,
मैंने हीनता और डर को गले लगा लिया है।
इस अंधी दौड़ की आधुनिक दुनिया में,
मैं अपनी ही भाषा को बोझ समझ बैठा हूँ।

न अब हिंदी सीखने की कोई सच्ची रुचि बची है,
न ही इस स्थिति को बदलने की कोई आशा नज़र आती है।
क्या यही मेरी पहचान है? क्या यही मेरा सच है?

लेकिन एक उम्मीद अभी बाकी है, इस नई पीढ़ी में,
जो अभी भी अपनी जड़ों—भाषा-प्रेम—को गले लगा सकती है।
आओ मिलकर एक नया प्रण लेते हैं,
इस उदासीनता से ऊपर उठकर, हिंदी का गौरव लौटाते हैं।

आओ, नया सवेरा—हिंदी दिवस मनाते हैं!

Hindi Poem by sachit karmi : 112036324
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