बीते मन के घावों को कुरेदना पीड़ा तो देता ही है..आने वाले क्षणों में मन का बोझ भी बन जाता है।
संत श्री कहते हैं… दुःख लोग नहीं देते, वह स्वयं का उठाया हुआ बोझ है। जैसे कोई व्यक्ति भार उठाए हुए हो तो पीड़ा उस भार से नहीं… उसे उठाए रखने और पकड़े रहने से होती है।