ज़िंदगी अक्सर हमारी ख्वाहिशों से मेल नहीं खाती,और आँखों के सामने बिखरती उम्मीदें अकेलेपन की ख़ामोशी में आँखों से होकर सीने तक चुभन बनकर उतरती हैं कैसे कहूँ कि इसे महसूस करके देखो,क्योंकि चुभन को शब्दों में समझाना और कल्पना में जीना दोनों ही मुमकिन नही है...!