भए प्रगट गोकुल के प्यारे
भादों की वह रैन कजरारी, आधी रात को पहरा भारी,
बंदीगृह में भयो उजियारो, प्रगटे लीलाधारी।
चतुर्भुज रूप धरयो हरि ने, देख देवकी मैया हर्षानी,
बन्धन टूटे, पहरे सोए, भई प्रभु की अचरज कहानी।
वासुदेव ले चले कन्हाई, सूप धरयो माथे पे उठाई,
कारे बादर गरजत भारी, यमुना मैया पार बुलाई।
उफन चलीं कालिंदी मैया, छुअन चहत मोहन के चरणा,
चरन छुए जब ठाकुर जी के, घट गयो पानी, मिली तब शरणा।
शेषनाग ने छत्र लगायो, मेघा बरसत बूंद बचायो,
गोकुल पहुंचे वासुदेव तब, नंद जी के भाग जगायो।
जसोदा मैया की गोद सुहाई, सोए रहे वहां कुंवर कन्हाई,
भोर भई जब गोकुल भीतर, घर-घर बाजन लगी बधाई।
आनंद भयो री आज ब्रज में, ढोल मंजीरा बाजत नीके,
दधि-माखन की मटकी फूटीं, कंस के सब मन भए फीके।
जय कन्हैया लाल की बोलें, गोपी-ग्वाल सब मगन हो जाए,
ऐसो जनम भयो गोकुल में, ठाकुर जी अब तारण आए।