प्रेम की परिभाषा
प्रेम की आखिर परिभाषा क्या है,
जो बिना कहे दिल में उतर जाए,
क्यों जन्म से ही हम सबसे जुड़ते हैं,
क्यों अपनों के लिए हर पल धड़कते हैं।
माँ की ममता में प्रेम मिलता है,
पिता के स्नेह में विश्वास मिलता है,
दोस्तों के साथ में हँसी मिलती है,
हर रिश्ते में प्रेम की झलक मिलती है।
फिर क्यों कोई इतना अपना हो जाता है,
कि उसके बिना मन उदास हो जाता है,
वह दूर चला जाए तो आँखें नम होती हैं,
और उसकी यादें हर पल संग होती हैं।
क्यों दिन-रात उसी का ख्याल आता है,
क्यों हर चेहरा उसी सा नज़र आता है,
क्यों उसकी बातें मन में बस जाती हैं,
क्यों उसकी यादें हमें तड़पाती हैं।
शायद प्रेम वही एहसास है,
जिसे शब्दों में बाँधना आसान नहीं,
जो पास हो तो जीवन मुस्कुराता है,
दूर हो तो मन को चैन नहीं।
प्रेम पाने का नाम ही नहीं,
प्रेम तो निभाने का नाम है,
किसी की खुशी में खुश हो जाना,
और उसकी याद में भी मुस्कुराना ही प्रेम है।
शायद यही प्रेम की परिभाषा है—
जिसमें ‘मैं’ से पहले ‘तुम’ आ जाए,
और कोई दूर होकर भी
हमारे दिल के सबसे करीब रह जाए।