अंकशास्त्र और सांख्य दर्शन
वर्तमान क्षण ही जीवन है... शून्य (०) है।
१ से ९ होने का भाव ही भूतकाल और भविष्यकाल है... यही समय का बंधन है।
आंतरिक उथल-पुथल अहंकार द्वारा पकड़कर रखे गए भावों का स्मरण है। हम स्वयं १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९ तक जाते हैं...
(१) अधिकार, वर्चस्व - सूर्य
(२) चिंता, निराशा, देखभाल - चंद्रमा
(३) अपमान, सम्मान - गुरु
(४) भ्रम, योजना - राहु
(५) दोषपूर्ण वाणी, मित्रता - बुध
(६) शोषण, दरिद्रता, संपत्ति - शुक्र
(७) अति अभाव, तृप्ति - लगाव, अलगाव - केतु
(८) लोभ, संघर्ष, सफलता, प्रगति - शनि
(९) क्रोध, व्याकुलता, बल, सुरक्षा - मंगल
इत्यादि 'मैं', 'मेरा' और 'मेरे' रूपी अहम् से जुड़ा हुआ भाव-विश्व है...
इस भाव-विश्व के साथ अहंकार के ० (शून्य) होने से ही वर्तमान क्षण में जिया जाता है।
अहम् से जुड़े भाव-विश्व का दर्पण समय है... इसीलिए यह भाव-विश्व समय की गति को धीमी या तीव्र करता है।
जब तक १ से ९ होने की अनुभूति रहेगी, तब तक (जीवन में) उथल-पुथल बनी रहेगी।