Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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कहें सुधीर कविराय- दोहा छंद
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सिया सी बेटी
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बेटी सिया समान क्या, जी पायेगी आज।
घर बाहर जब एक सा, चलता कौरव राज।।

भला सिया सी बेटियाँ, कर पायेंगी खून।
प्रेम, प्यार के फेर में, भूलें आप सूकून।।

बेटी सिया समान हो, सभी चाहते आज।
पर उनको दिखता नहीं, खुद का कैसा काज।।

नहीं चाहती बेटियाँ, बनना सिया समान।
क्योंकि उनको व्यर्थ में, शौक नहीं दें जान।।

आज सिया सी बेटियाँ, करती सारे काम।
रखती इतना हौंसला, चमकाती कुल नाम।।

आज सिया सी बेटियांँ, सहतीं मुश्किल रोज।
पग-पग पर रावण खड़े, मिल जाते बिन खोज।।

बेटी सिया समान क्यों, नहीं चाहते लोग।
आखिर कितना आज वो, सह पायेंगी रोग।।

आज सिया सी बेटियाँ, रोने को मजबूर।
हैं समाज के दंश से, हार -हार कर चूर।।

जानें कितनी बेटियाँ, करें घिनौना काम।
बिना दोष माता-पिता, परिजन भी बदनाम।।

मातु-पिता को भूलकर, चलें प्रेम की राह।
टुकड़ों में कटकर मिलें, परिजन करते आह।।

बात सिया की क्यों करें, बेटी की नहिं चाह।
माँ की कोख में बेटियां, डरकर भरतीं आह।।
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राम दान की लूट
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राम दान की लूट है, मार लीजिए हाथ।
चना-चबेना संग में, आप जाएगा साथ।।

जितना चाहे कीजिए, राम दान की लूट।
जिसकी जितनी पहुँच हो, उसको उतनी छूट।।

राम दान की लूट से, नहीं लगेगा पाप।
करते रहिए संग में, सियाराम का जाप।।

राम दान की लूट में, बजरंगी भी मौन।
जितना चाहो लूट लो, भला रोकता कौन।।

खुला हुआ मैदान है, लूटो जाकर आप।
राम दान को लूटना, कहाँ आज है पाप।।

मंद -मंद मुस्का रहें, मंदिर में प्रभु राम।
राम दान की लूट भी, रामराज्य के नाम।।

लक्ष्मण जी सोये हुए, मत डालो व्यवधान।
खेल लूट का चल रहा, संग धर्म का गान।।

राम लला की देख लो, महिमा अमिट पार।
नाम जपे जो प्रभु का, पाये खुशी हजार।।

भक्त आस्था का हुआ, ये कैसा अपमान।
चोरी करने के लिए, शेष राम का दान।।

दान धर्म करते रहें, मन को रखिए साफ।
भूल-चूक ईश्वर सदा, तभी करेगा माफ।।

धोखा देकर श्रीराम को, मिला कौन सा राज।
बड़ा जगत में और है, बतला दो तुम ताज।।

चंदा चोरी आड़ में, किया धर्म का काम।
इसका प्रतिफल शीघ्र ही, देंगे मेरे राम।।

चंदा चोरी को नहीं, मत कहिए अपराध।
इसी राह प्रभु राम को, चाह रहा था साध।।

आर्तनाद इतना नहीं, अच्छा मेरे यार।
चंदा चोरी तब किया, पहले समझा सार।।

राम कृपा जिन पर नहीं, वही समझते चोर।
चंदा जिनके भाग्य में, उनके नाचे मोर।।

भक्त कर रहे आर्त हैं, सुनिए मेरे राम।
चंदा चोरी के लिए, मुझको भी दो काम।।

भक्त कर रहे आर्त हैं, सुनिए मेरे राम।
क्या मिल सकता है मुझे, चंदा चोरी काम।।

आर्तनाद इतना नहीं, अच्छा मेरे यार।
चंदा चोरी तब किया, पहले समझा सार।।

जाने कब से कह रहा, सुनते कब हैं राम।
चंदा चोरी के लिए, माँगूँ मैं भी काम।।

छोटा सा अपराध है, चंदा चोरी नाम।
जिसको भी लगता गलत, बैठें पीकर जाम।।

राम कहें सुन भक्त रे, तेरा कैसा काम।
नाम जपो निष्काम हो, मिटे जगत का दाम।।

राम दान को लूटना, छोटा सा इक काम।
संग जाप प्रभु नाम का, पावनता निष्काम।।

प्रभु आपसे है मुझे, बड़ी शिकायत आज।
चंदा चोरी खेल का, आखिर क्या है राज।।

राम कहें सुन भक्त तू, कैसा माँगे काम।
छोड़ जगत का मोह सब, जपो नाम निष्काम।।
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अंतिम
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कौन दिवस अंतिम दिवस, नहीं जानते लोग।
जब तक मौका हाथ में, सुख सुविधा लें भोग।।

पकड़ हमें यमराज तो, अंतिम देगा साथ।
मैं तो अब हूँ खड़ा, फैला दोनों हाथ।।

सबको बनना एक दिन, निश्चित अंतिम राख।
हर प्राणी की बस यही, केवल इतनी साख।।

अंतिम साँस तो एक है, जिसका किसे है ज्ञान।
फिर मानव तू क्यों करे, लोभ मोह अभिमान।।

अंतिम ही तो सत्य है, सबकुछ अंतिम बार।
जीवन में सबसे बड़ा, केवल इतना सार।।
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मर्यादा दर्शन
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बड़े-बुजुर्गों को नहीं, मिले आजकल भाव।
मर्यादा भूले सभी, देते हैं नित घाव।।

दोषी हम अरु आप भी, देख रहे हैं रोज।
मर्यादा की आड़ में, अर्धनग्न की खोज।।

घर में भी अब नारियाँ, बन रहती बेशर्म।
मर्यादा भूले सभी, दोषी केवल कर्म।।

नारी को अब मिल रहा, खूब बढ़ावा आज।
पुरुष वर्ग मजबूर है, बचा रहा निज लाज।।

नारी फैशन नाम पर, होती जाती नग्न।
मर्यादा को भूलकर, करती रहती सन्न।।

मर्यादा की फ़िक्र अब, भला किसे है आज।
नित्य कलंकित हो रहा, घुलता जहर समाज।।

स्वार्थ लोभ में हम सभी, रहते बड़े प्रसन्न।
मर्यादा को भूलकर, खाते दूषित अन्न।।

मर्यादा को भूलकर, हम करते तकरार।
संस्कृति अरु संस्कार को, रोज रहे दुत्कार।।

लोभी कपटी हैं बने, मत कहिए संयोग।
मर्यादा भूले सभी, करना केवल भोग।।

बहन-बेटियों अब नहीं, रही सुरक्षित आज।
चाचा भाई पिता भी, लूट रहे हैं लाज।।

मर्यादा की सीख दें, मन में भरे विकार।
करते ऐसे काम हैं, धर्म बड़ा लाचार।।

संबंधों का ये नया, आया कैसा दौर।
ढूँढ रहे अनुबंध में, अब रिश्तों का ठौर।।
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कहा मित्र यमराज ने, ले अब तू वैराग्य।
या फिर मेरी मित्रता, का कर दे परित्याग ।।

लेने का वैराग्य का, आता मन में भाव।
लोभ-मोह के दंश का, टीस रहा है घाव।।

मन मधुबन मेरा हुआ, जैसे रेगिस्तान।
इधर-उधर मैं देखता, बैठा व्यर्थ मचान।।

कब जग से करना गमन, नहीं जानते लोग।
इसीलिए क्या पालते, अंहकार का रोग।।

मम प्रियवर यमराज तू, अब तो आप जा यार।
संग तेरे करने गमन, बैठा साज सँवार।।

जिसको मेरे साथ में, बड़ा गमन का लोभ।
आ जाये वो त्याग कर, ईर्ष्या कुंठा क्षोभ।।

गमन राम जी ने किया, सीय लखन के साथ।
कल क्या होगा छोड़कर, झुका अवध को माथ।।

सतगुरु की महिमा बड़ी, नाम अमित अनंत।
ईश्वर से भी बड़ा है, सच्चा जग भगवंत।।

बंद नहीं शोषण हुआ, भले देश आजाद।
संविधान सोया हुआ, कौन सुने फरियाद।।

नारी शोषण आज भी, करते रहिए नाज।
नाहक हम सब कह रहे, पढ़कर बढ़ा समाज।।

जब इतने कानून हैं, तब भी अत्याचार।
आमजनों की जिंदगी , होती रोकर पार।।

खुलेआम तो हो रहे, नित ही अत्याचार।
रक्षक जब भक्षक बने, करती क्या सरकार।।

उड़ता नित माखौल है, कानूनों का आज।
पिसता रोज गरीब है, कैसा समता राज।।

पैसों पर कानून का, कब चलता है जोर।
आम जनों की आड़ में, झूठा इसका शोर।।

हम करते सम्मान हैं, जो मेरा कर्तव्य।
भले आप हैं ढ़ूँढते, पीछे का मंतव्य।।

देते जो सम्मान हैं, वे सब नहीं हैं मूढ़।
इसके पीछे तथ्य जो, मान रहे क्यों गूढ़।।

जो अपमान से है परे, वही आज खुशहाल।
जो चिंता इसकी करे, उसके संग बवाल।।

दूजा के अपमान से, क्या मिलता है ताज।
हमको भी समझाइए, पीछे इसके राज।।

अब अटूट रिश्ते सभी, होते खंड विखंड।
जिसके प्रतिफल में मिले, हम सबको ही दंड।।

मन मिल जाए यदि अगर, रिश्ते बनें अटूट।
बिना खून संबंध भी, नहीं चाहते छूट।।

मातृ शक्ति सम्मान का, है अँबुबाची पर्व।
बढ़े धरा की उर्वरता, कृषकों को हो गर्व।।
माँ कामाख्या का यही, जगती को उपहार।
भक्ति भाव श्रद्धा सहित, आप जीवनी सार।।

माँ कामाख्या धाम का, महिमा बड़ी महान।
अँबुबाची तो नाम है, गूँजित मंत्र स्थान।।

असम राज्य में भक्ति का, श्रद्धा शक्ति अपार।
इस उत्सव में है अलग, नव उल्लासित सार।।

पाती पढ़कर प्रेम की, उपजा मन में झोल।
जाने कब इस नेह का, बोरा-बिस्तर गोल।।

पढ़कर पाती प्रेम का, साँसों के ही नाम।
नाहक जग में बन गए, बदनामी का धाम।।

पढ़कर पाती प्रेम की, मैं तो हुआ अधीर।
लगता मुझको है सखी, आज बना मैं वीर।।

मुखमंडल मेरा खिला, यौवन नवल उछाल।
पढ़कर पाती प्रेम की, मन में उड़े गुलाल।।

आज परीक्षा है कठिन, झूठा अफलातून।
पढ़कर पाती प्रेम की, भागा तत्क्षण दून।।

पढ़ा लिखा भी आज कल, धक्के खाता रोज।
मिलती नहीं है नौकरी, करे कहाँ तक खोज।।

जाने कैसे है बढ़ा, उनका धन भंडार।
और वही अब कह रहे, झूठ की है सरकार।।

मेघ गरजते, बूँद झड़ें, सड़कें हैं जलमग्न।
चलता रहता डाकिया, कर्तव्य पथ निर्विघ्न।।

चाहे जैसी भी मुश्किल हो, रखता इतना ध्यान।
चिट्ठी में साँसें बसी, सुख-दुख सभी विधान।।

आतुर मन की बात को, भला समझता कौन।
मिलन-बिछुड़ना जगत की, रीति भले ही मौन।।

पक्षी आतुर नीड़ का, ढले साँझ के साथ।
सुख-दुख में भी थामकर, रहते दूजा हाथ।।

मानव आतुर हो रहा, बिना किसी सुर-ताल।
जाने क्या आता मजा, व्यर्थ बजाता गाल।।

सपना है यमराज का, करना है हुड़दंग।
जन्मदिवस पर मित्र के, खाना-पीना संग।।

साधन बढ़ते जा रहे, हम होते कमजोर।
फिर करते हैं क्यों भला, इतना ज्यादा शोर।।

साधन का होने लगा, जबसे बहु उपयोग।
तबसे हम सुनने लगे, नये नाम का रोग।।

तपता जून गया अब, वर्षा की है आस।
तब सुकून हमको मिले, भीगेगा आकाश।।

जून गया मन में जगी, वर्षा की इक प्यास।
बूँद गिरी जब से यहाँ, मिला सुकून सुवास।।

खाई से बचकर रहें, खोल आँख अरु कान।
जाने कब किस मोड़ पर, छिन जाए जान।।

भाई जो अपने रहे, वही खींचते टाँग।
रिश्तों के संसार में, घुलती जाए भाँग।।

जीवन से हमको करो, प्रभु जी अब बर्खास्त।
इतना जितना जी लिया, है बिल्कुल पर्याप्त।।

चंदा चोरों को अभी, करो तनिक बर्दाश्त।
इतनी जल्दी मत करो, क्यों करते बर्खास्त।।

जीवन का है क्या पता, जाने कब बर्खास्त।
जाने कब इस प्राण का, हो जाए सूर्यास्त।।

चाह रहे सुविधा सभी, बिना किए कुछ काम।
इच्छा केवल एक है, मिले मुफ्त में दाम।।

सुविधा के अनुरूप ही, रिश्तों को अब भाव।
वरना सभी छिपा रहे, अपने गहरे घाव।।

चंदा चोरी में नहीं, मेरा कोई दोष।
सुविधा पाया तब किया, आप करो मत रोष।।

आफत में भगवान को, क्यों करते अब याद।
कल तक तो थे कह रहे, सब हैं मेरे बाद।।

चंदा चोरी मानिए, आफत यही समाज।।
पाप कर्म जो भी हुआ, देख चकित यमराज।।

आफत जब भी आ पड़े, धीरज रखिए आप।
आया जाने के लिए, करो नहीं संताप।।

व्यर्थ लगाते क्यों भला, झूठा सब आरोप।
निश्चित मानो एक दिन, सहना ईश्वर कोप।।
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मिथ्या सब आरोप ही, लगा रहे हैं लोग।
क्या इन सबको हो रहा, आज मानसिक रोग।।

हम सब इतने चतुर हैं, सुने नहीं आरोप।
चढ़ जाते हैं क्रोध में, नाहक लेकर तोप।।

समय गँवाता जो नहीं, करता कर्म विचार।
जान रहा हर व्यक्ति भी, होता तभी सुधार।।

मन संतोषी भाव से, जो करता आहार।
उस पर ईश्वर की कृपा, होता सभी सुधार।।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112029902
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