खण्ड 02 : महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध
क्या एक राजा का स्वाभिमान पूरे राष्ट्र की नियति बदल सकता है?
“सहस्त्र वर्षों से चल रहे जिस धर्मयुद्ध को इतिहास की किताबों ने चंद पन्नों में समेट दिया, यह कहानी है उस युद्ध के महानायक की। खण्ड 2 में कदम रखिए उस रक्तरंजित दौर में, जहाँ एक तरफ दिल्ली सल्तनत का अजेय साम्राज्य था, और दूसरी तरफ अरावली की पहाड़ियों में गूँजती महाराणा की हुंकार!
यह सिर्फ तलवारों की जंग नहीं है। यह न्याय और अन्याय, धर्म और अधर्म, और सबसे बढ़कर—अस्तित्व की लड़ाई है। जब अपनों ने ही पीठ में छुरा घोंपा, और महलों का वैभव छोड़कर घास की रोटियाँ नसीब हुईं, तब महाराणा ने ऐसा कौन सा संकल्प लिया जिसने मुगलों के अहंकार को घुटनों पर ला दिया?
इतिहास के छिपाये गए पन्नों से निकली एक ऐसी गाथा, जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि असली 'विजय' किसकी हुई थी।
पन्ने पलटिए और खुद गवाह बनिए उस महासंग्राम का, जिसने भारत का भूगोल और भविष्य दोनों बदल दिया।”
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