* फासले *
कहना तो बहुत कुछ है आज भी तुमसे, पर अब वो बात नहीं,
पहले दूर होकर भी थे पास हम, अब पास होकर भी वो जज़्बात नहीं।
मैं बात करूँ तो बात होती है, वरना खामोशी का सन्नाटा है,
मेरी हर कोशिश के पीछे, बस तुम्हारा ही तो वास्ता है।
सुबह से शाम और शाम से रात ढल जाती है,
मेरी बेकरारी तुम्हारी बेरुखी में ही पल जाती है।
मेरा तो दिन ही नहीं ढलता, बिना तुमसे एक बार बात किए,
और तुम हो कि तुम्हें याद भी नहीं, कि गुज़रे हैं कितने दिन साथ लिए।
शायद अब फर्क नहीं पड़ता तुम्हें, कि मैं हूँ या नहीं हूँ,
मैं पागल आज भी यही सोचती हूँ कि तुम्हारे लिए खास हूँ या नहीं हूँ?
ये कैसा मुकाम है, जहाँ मैं खुद को ही खो रही हूँ,
तुम्हारे पास होकर भी, मैं हर पल बस रो रही हूँ।
क्यों तुम बदल गए? क्यों ये एहसास बदल गया?
क्यों वो प्यारा सा रिश्ता, एक मायूसी में बदल गया?
सवाल बहुत हैं दिल में, पर अब जवाब नहीं माँगना,
तुमसे तुम्हारी ही मर्ज़ी का, कोई हिसाब नहीं माँगना।
बस थक गई हूँ अब, खुद को ही सही साबित करते-करते,
बिखर गई हूँ मैं, तुम्हारे इंतज़ार में, घुटते-घुटते।
अब तुम खुश हो अपनी दुनिया में, तो मुझे भी संभलने दो,
जो जगह थी दिल में तुम्हारी, अब उसे खाली ही रहने दो। 🥀💔😔✨
(प्रिया.....)