पितृ दिवस पर
पिता को समर्पित
(1)
आज पितृ दिवस का पावन दिन, श्रद्धा के दीप जलाता हूँ,
अपने पिता के चरणों में, मन के सुमन चढ़ाता हूँ।
जिनकी बदौलत जीवन पाया, सपनों को आकार मिला,
उनके त्याग और तप से ही, खुशियों का संसार मिला।
(2)
जब भी जीवन की राहों में, घोर अँधेरा छा जाता था,
पिता का साहस बनकर सूरज, हर संकट को हर जाता था।
उनकी बातें दीपक बनकर, मन का पथ आलोकित करतीं,
टूटे हुए विश्वासों में भी, नई उमंग संचारित करतीं।
(3)
अपने हिस्से की धूप समेटे, हमको शीतल छाँव दी,
काँटों भरी डगर पर चलकर, हमको फूलों की राह दी।
उनकी मेहनत के पसीने ने, घर की किस्मत लिख डाली,
अपने अरमानों की कीमत पर, बच्चों की झोली भर डाली।
(4)
पिता कोई शब्द नहीं है, जीवन का आधार हैं,
घर की मजबूत नींव हैं वे, खुशियों का भंडार हैं।
उनकी आँखों में छिपे हुए, कितने अनकहे सपने होते,
बच्चों की मुस्कानों में ही, उनके सारे अपने होते।
(5)
जब दुनिया ने ठोकर दी, तब पिता ने हाथ थाम लिया,
हार के क्षण में भी मुझको, जीत का सच्चा नाम दिया।
उनके अनुभव की छाया में, हर उलझन आसान हुई,
उनकी सीखों से ही मेरी, जीवन राह महान हुई।
(6)
उम्र की धूप ने चेहरे पर, झुर्रियों के फूल खिला दिए,
लेकिन बच्चों के प्रति प्रेम ने, मन के दीप जला दिए।
आज भी उनकी आँखों में, वही पुराना प्यार दिखे,
समय बदल जाए चाहे, उनका स्नेह अपार दिखे।
(7)
आज के इस शुभ अवसर पर, बस इतना सम्मान करें,
जीते जी अपने पिता का, दिल से हम गुणगान करें।
जो हाथ पकड़कर चलना सिखलाएँ, उनका मान बढ़ाएँ,
उनकी सेवा और आदर से, जीवन को धन्य बनाएँ।
(8)
हे ईश्वर! हर पिता के जीवन में, खुशियों का उपहार रहे,
उनके चेहरे पर सदा ही, मुस्कानों का श्रृंगार रहे।
पितृ दिवस पर नमन हमारा, हर उस पिता के नाम रहे,
जिसके त्याग और प्रेम से, जग में जीवन धाम रहे।
✍️ विजय शर्मा ऐरी