चलते-चलते अचानक मेरी नज़र उस लिपिस्टिक के पेड़ पर ठहर गई।
वो दूर अकेला खड़ा था।
अजीब लगा… क्योंकि मैंने ऐसे पेड़ों को हमेशा झुंड में देखा था—
कभी दो, कभी चार, कभी छह।
पर ये?
ये तो अकेला ही था।
ऐसा लगता था जैसे बाक़ी पेड़ों ने इसे अपने बीच से निकाल दिया हो।
मानो इसने कोई ग़लती की हो,
कोई ऐसा अपराध, जिसके बाद सबने इसे छोड़ दिया।
अब वो खड़ा था—तन्हा, सबकी नज़रों से दूर।
उसकी खामोशी भारी थी,
उसकी जड़ें जैसे धरती से सवाल कर रही थीं—
“क्या सचमुच मैं अकेला हूँ?
क्या सचमुच मैं लायक नहीं हूँ?”
तभी मेरी नज़र उसकी डालियों पर पड़ी।
कुछ चिड़ियाँ वहाँ चहचहा रही थीं।
उन्होंने टहनियों के बीच अपना छोटा-सा घर बना लिया था।
वे उड़तीं, लौटतीं, फड़फड़ातीं…
और हर आवाज़ के साथ उस पेड़ की तन्हाई टूटने लगी।
अब वो पेड़ अकेला नहीं था।
उसकी शाखों पर ज़िंदगी थी,
उसके तनों पर भरोसा था,
और उसकी खामोशी में फिर से सुर लौट आए थे।
मानो वो पंछी उसकी ओर देखकर कह रहे हों—
“भले ही सबने तुझसे मुँह मोड़ लिया हो,
पर तू सचमुच कभी अकेला नहीं होता।”