चारपाई की व्यथा*
*- डॉ वंदना शर्मा*
आज एक विचित्र सपना देखा
पूछो तो क्या देखा
आई मेरे सपने में आज 'चारपाई'
बोली क्यूँ नहीं देती मैं आज दिखाई
पहले हर घर में होती थी
मेरी भी बहुत शान होती थी
शहरीकरण की नजर लग गई
आधुनिकता ने मेरी जान खाई
अब तो गाँव में भी ना दे दिखाई
मेरी जगह डबल बेड ने पाई
तुम्हीं बताओ, क्या मेरी याद न आई
कितनी ही जुड़ी मुझसे बचपन की यादें
मैं भी थी चौपालों की परछाई
पंजाबी ढाबों की शान है आज भी
बड़ी खूबसूरत होती है चारपाई
विदेशों में भी अपनी जगह बनाई
डॉक्टर ने भी उपयोगी बताई
फिर क्यूँ उपेक्षित है चारपाई
सुनकर उसकी व्यथा ये
मेरी भी आँखें भर आई
याद मुझे भी बचपन की आई
घर में आयेगी अब चारपाई
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi