व्यंग्य - गंगा दशहरा
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आप सभी को बधाइयाँ शुभकामनाएँ हैं
क्योंकि आज गंगा दशहरा है
इस दिवस की भी औपचारिकता निभाइए।
और कुछ तो आप कर नहीं सकते
माँ गंगा का अपमान कर उपहास ही कीजि
उनका आँचल मैला कीजिए।
उनकी लहरों के बीच नाव में बैठकर
मांस-मदिरा का आनंद लीजिए
और हड्डियाँ, जूठे पत्तल, गिलास
उनके आँचल में फेंक जाति-धर्म का नंगा नाच कीजिए।
वैसे भी माँ गंगा भला आपका क्या बिगाड़ लेंगी
वो माँ हैं, मजबूरी में ही सही,सब सह ही लेंगी।
जैसे गाय भी तो हमारी माता हैं
जिन्हें कुछ भी तो नहीं आता है।
आप बड़े बेवकूफ और हम समझदार हैं
क्या अब यह भी हम ही बताएँ?
कि इसमें आखिर किसका, कितना अपराध है,
हम जन्म देने वाली माँ को जब कुछ नहीं समझते हैं,
तब आप गंगा और गऊ माँ के नाम
नाहक भाषण देकर अपना समय बर्बाद करने का
भारी अपराध भला कैसे कर सकते हैं?
हम माँ गंगा के लाड़ले लाल हैं
गंगा दशहरा की औपचारिकता निभाकर
अपना अधिकतम कर्तव्य निभाते हैं,
आपकी तरह बेवजह समय नहीं बर्बाद करते हैं।
अब आपको नहीं समझ आता
तो भला हम क्या कर सकते हैं?
हम भी आपकी तरह बेवकूफ तो नहीं हो सकते हैं।
गंगा हमारी माँ है!
हम उसके साथ कुछ भी करने का
जन्म सिद्ध अधिकार रखते हैं,
बस! इसीलिए तो गंगा दशहरा मनाते हैं,
बड़ी मुश्किल से किसी तरह माँ गंगा पर
इतना बड़ा एहसान करने का समय निकाल पाते हैं,
उसको नमन वंदन कर याद करने का उपक्रम करते हैं।
सुधीर श्रीवास्तव