तुम्हें खोने का ख्याल
मेरी रूह तक हिला देता है,
जैसे कोई हँसता हुआ चेहरा
अचानक रोना सीख लेता है।
तुम्हारी आदत ऐसी लगी है
कि अब खुद से भी डर लगता है,
तुम बिन ये दिल
भीड़ में भी अकेला लगता है।
जो हर रात मेरी थकी आँखों को
प्यार से नींद पहनाता है,
मेरे हर टूटे लफ्ज़ को
अपना कहकर अपनाता है।
कल अगर वही हाथ
किसी और का हाथ थामेंगे,
क्या मेरी उंगलियों की कमी
उन्हें कभी महसूस भी होगी?
क्या वो रातें, वो बातें,
वो मेरी बेवजह की जिद,
तुम्हारे नए रिश्तों के बीच
कहीं धीरे-धीरे मर जाएँगी?
मैं सोचती हूँ —
जब तुम्हारे घर में किसी और के नाम की
हँसी गूँजेगी,
तब क्या मेरी याद
तुम्हारे दिल में चुपचाप रोएगी?
या फिर सच में
मोहब्बतें बदल जाती हैं,
लोग नए रिश्तों में
पुराने एहसास भूल जाते हैं।
पर मेरा इश्क़ ऐसा नहीं है…
मैं तुम्हें कल के डर से भी
आज कम नहीं चाह सकती,
क्योंकि तुमसे मोहब्बत
मेरी आदत नहीं, मेरी इबादत है।
और शायद इसी लिए
तुम्हें किसी और के साथ सोचकर
मेरी पूरी दुनिया
अंदर ही अंदर टूट जाती है।