मैं और मेरे अह्सास
अकेलापन
अकेलेपन का रूतबा निराला होता हैं l
अपनेआप से राब्ता निभाना होता हैं ll
कोई किसी को देखने के लिए राजी नहीं l
खुद के लिए खुद को सजाना होता हैं ll
चैन और सुकून की दुनिया अच्छी है l
दिल को ललचा कर मनाना होता हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह