सांसों के रुकनें तक का ये डर कैसा था
समझ न पाया ये सफर कैसा या
छोड़ के जा चुका राह में तन्हा मुझको
संग चलने वाला ये हमसफर कैसा था
कहाँ लापता हो गयी कश्ती सागर की
मेरे अन्दर सोया ये समंदर बेखबर कैसा था
मुस्कुराते हुए दम तोड़ा हमनें
पी गया मैं, ये जहर कैसा था
दिवारों की सिसक सुनाई देती थी
छत से टपकतेे थे आँसु,वो घर कैसा था
रात हंसते हुए सो गया था मैं
सुबह देखा तकिया, ये तर कैसा था