मैं कुछ खोज रहा हूं ✨
जब नहीं मिले थे तुम तब बैचेन था, और अब भी हूं।
था लगा मुझे कि सुकून (चैन) हो तुम, लेकिन मैं गलत था।
मैंने अनगिनत प्रयोग किए, बेचैनी को चैन में बदलने के,
परिणाम मात्र एक, बेचैनी का और उन्नयन हुआ,
प्रयोगों में शामिल थे तुम और सारा जहाँ (संसार),
जहाँ (जगह) मैं प्रयोग कर रहा था।
लक्ष्य मात्र एक , बैचेनी को चैन में स्थापित करना।
क्या यह बाहरी प्रयोगों से संभव है भी ?
अगर होता तो फिर इतनी बेचैनी क्यों ?
हर प्रयोग में गलती मात्र यही, कि ख़ुद पर प्रयोग नहीं,
जब खुद को उतारा ख़ुद पर , आलोकन हुआ खुद का,
अवलोकन का परिणाम मात्र एक, अवलोकन करने वाला ही आलोकमय हुआ।
- यथार्थ