रक्त पीपासू
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तुम जा चुकी हो,
ट्रेन जा कर
लौट भी चुकी है।
आख़िरी आलिंगन को
छह साल हो गए।
वह कैफ़े नहीं रहा,
और अब तो
लाइब्रेरी भी
बंद हो चुकी है।
सब कुछ
एक मुस्कुराहट के बाद
थम चुका है,
मिट चुका है,
या फिर जंग खाकर
बुरादा हो गया।
मगर अभी भी
जोंक-सा चिपका हुआ है
धत् रसाला,
यह अपराधबोध।
@ कुणाल कुमार