एक अनकहा सा एहसास है वो, जो सबको जोड़कर रखती है,
कच्चे धागों के इस घर को, वो प्रेम से बुनती है।
वो माँ की थकान को, एक पल में पहचान लेती है,
और पिता की खामोशी में भी, सब कुछ जान लेती है।
वो जब खिलखिलाती है, तो घर के दर-ओ-दीवार हंसते हैं,
उसकी छोटी सी शरारत में, खुशियों के मेले बसते हैं।
कभी माँ बनकर गुड़िया को, लोरी वो सुनाती है,
कभी बड़ी होकर पूरे घर को, वही संभालती है।
वो उस दीये की लौ है, जो खुद को जलाए रखती है,
मगर अपने परिवार की दुनिया, सदा रोशन रखती है।
लोग कहते हैं कि बेटियां, विदा होकर चली जाती हैं,
पर हकीकत में वो यादों बनकर, हर कोने में रह जाती हैं।
मायके की देहलीज छूकर भी, वो रिश्ता नहीं छोड़ती,
ससुराल को अपनाकर भी, वो जड़ें नहीं तोड़ती।
वो दो घरों के बीच की, एक मजबूत कड़ी है,
ईश्वर की रची हुई, वो सबसे अनमोल घड़ी है।
जिस घर में बेटी की, पायल की छन-छन होती है,
समझो खुदा की रहमत, उसी आंगन में सोती है।
उसे प्यार देना, उसे सम्मान देना हर हाल में,
क्योंकि असली लक्ष्मी तो, सिर्फ बेटियों में होती है।