सुंदरता क्या है…
नैनों की भूख है या,
या समाज की बनाई कोई तस्वीर,
जो हर चेहरे पर एक जैसा नाप ढूंढती है?
कभी वो आँखों में ठहर जाती है,
एक मुस्कान की हल्की सी लकीर बनकर,
तो कभी शब्दों में छलकती है,
किसी के सच्चे व्यवहार की तरह।
समाज ने बाँधना चाहा उसे,
रंगों, आकारों और मापों में,
पर वो तो बहती रही चुपचाप,
हर दिल की अपनी किताबों में।
नैनों को जो भा जाए, वो पलभर की छाया है,
भीतर जो चमक उठे, वही असली माया है।
क्योंकि चेहरों की चमक ढल जाती है एक दिन,
पर आत्मा की रोशनी कभी कम नहीं होती।
तो सुंदरता…
न तो केवल नैनों की भूख है,
न ही सिर्फ समाज की बनावट,
वो तो एक एहसास है—