स्त्री तेरी खोज क्या है, तू पता कर जरा,
अपने भीतर छिपे उस असीम आकाश को छूकर जरा।
तू केवल मर्यादा की लकीर नहीं, एक बहती जलधारा है,
तू थकी हुई राहों का सुस्ताता हुआ एक किनारा है।
बंधी है तू सदियों से जिन रस्मों और रिवाजों में,
उन बेड़ियों को तोड़कर अपनी आवाज़ पहचान जरा।
न तू अबला है, न तू बेचारी, तू खुद में एक शक्ति है,
तेरी सहनशीलता कमजोरी नहीं, तेरी गहरी भक्ति है।
दुनिया की नजरों से खुद को आंकना अब बंद कर,
तू खुद अपनी पहचान की मुकम्मल किताब है जरा।
उठ, कि तुझे अभी मील के पत्थर पार करने हैं,
तुझे अपने सपनों के रंगों से नए संसार भरने हैं।
तेरी खोज बाहर नहीं, तेरे अपने वजूद के भीतर है,
स्त्री, तू खुद में ही एक पूरा ब्रह्मांड है जरा।