*अधूरा हिसाब*
आज फिर घड़ी की सुइयां ठहर गई हैं
पर यादों का शोर थमता नहीं
आंखें थक कर मूंद तो लीं मैंने
मगर ये मन...
ये अब भी उन्हीं गलियों में भटक रहा है
जहाँ मेरी ईमानदारी का सौदा हुआ था।
अजीब है न?
मैंने तो अपना खून-पसीना एक किया था
एक एक ईंट जोड़कर भरोसा बनाया था
पर बदले में मुझे क्या मिला?
वो कड़वे शब्द...
जो अब भी सीने में किसी ज़हरीले काँटे से चुभते हैं।
कहने को तो मैं ठीक हूँ
सुबह उठकर वही मुस्कान भी पहन लेता हूँ
ताकि दुनिया को मेरी हार न दिखे
पर आशीष के भीतर का वो शख्स
आज भी उन बातों से लहूलुहान है
जो बिना सोचे, बिना समझे कह दी गईं।
मैंने किसी को खोया नहीं है
बस अपनों पर से वो अंधा विश्वास खो दिया है
अब रातें लंबी लगती हैं
क्योंकि अब नींद नहीं,
सिर्फ सवाल आते हैं।
*Adv.आशीष जैन*
*7055301422*
*फिरोजाबाद*