लम्हों की आज़ादी।
ज़िन्दगी यूँ न बेकार अफ़सोस करें हम,
डर के सारे क़िले तोड़ नई राह चलें हम।
मन में कोई कटुता ठहरने न पाए कभी,
माफ़ी देकर दिल को हल्का करें हम।
होंठ पर रोक न हो, हँसी खुलकर बहे,
दर्द जो भी मिले, ताक़त में ढालें हम।
प्रेम सच्चा ही रहे, शर्त कहीं भी न रहे,
मन की हर प्यास चुपचाप ही सहें हम।
जो भी पल दे गया है मुस्कान का रंग,
उस दुख की दीवारों को दूर हटाएँ हम।
कहता है ‘प्रसंग’, जीने का सीधा नियम,
हर नई साँस के संग अर्थ नया गढ़ें हम।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर