“सत्य का सफ़र”
मत जाओ हर दर पे, ये सच नहीं मिलता,
अंदर में जो उतरे, वहाँ सब नूर मिलता।
मंदिर हो या मस्जिद, सभी राह एक ही हैं,
दिल साफ़ हो जब, तो सारा हक़ मिलता।
राम, रहीम, ईसा का बस नाम जपते रहें,
खुद की पहचान बिना, कहाँ फल मिलता।
कृष्ण की मधुर बंसी, ईसा का करम भी,
अंतर की ख़ामोशी में हर नया सुर मिलता।
बुद्ध की वही वाणी, महावीर की तपस्या,
हर मार्ग के भीतर ही, नेक सत्य मिलता।
बाहर जो भटकेगा, वो रहेगा सदा तन्हा,
आँखें कर ले बंद तो, वही ऐ रब मिलता।
हर लफ़्ज़ में छुपा है, इक गहरा सा प्रसंग,
आत्मा को जो समझे, उसे सार मिलता।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर