"अधिक मात्रा"
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वहां कोई नहीं रहता
उस शहर में
बस मोबाईल पकड़े
हाथ रातों में देर तक
देखे जा सकते हैं।
सोशल होना
आजकल की व्याख्या में
किसी से भी न मिलना है।
वह मेरा दोस्त है
या शायद था
शोले की जय की तरह
मैंने उसे आखरी बार
उसी शहर में छोड़ा था
इंटरनेट की फायरिंग हो रही थी
मैं रुकना चाह रहा था
पर,
उसने सिक्का उछाल दिया।
भीड़ में खुद को
जब्त करते हुए
कभी जेब से बाहर
मोबाईल न निकालना
आज के दौर का अजीबपन है।
अपने होने का अहसास
तीव्रता से काम करते हुए
तभी होता है
जब कोई नोटिफिकेशन
याद दिलाता है
कि, मैं भी जिंदा हु।
घर लौटती
हवाएं
अब शाम को
एक जगह पर बैठकर
बस बैठी नहीं रहती
उसके सामने खड़ी
स्क्रीन उसके बाद भी
रहती है।
खुशी
दिखाई जा रही है
मैं सच जानता हु
आज का वक्त खुद में
कितने तीरे लिए
आगे बढ़ रहा है।
एक चुभन
हमेशा भीतर उठती हैं
सन्नाटे में दुबकी खामोशी
हर नींद का कत्ल करने
के लिए काफी है।
मैं वही से गुजरता हु
जिस शहर में
कोई नहीं रहता
पर भीड़ आज भी
तो है,
बस उसकी जगह बदल गई है।
कमजोर इंसान
कही भी मिट्टी में दबे हुए
दिखाई पड़ते है
उनके अपने पेड़
हैं जिनकी शाखाओं पर
वाय फाय के बंदर लटक रहे
उनके केले चुरा रहे हैं।
अनपढ़ लोग ही
जानते हैं
अक्षर में शब्द छुपे नहीं हैं
शब्दों में झल्लाहट भरी है
लब्ज़ ही कमेंट होते है
कमजोरी जल्दी ट्रोल होती है।
भीड़ भरी हुई
उनकी झुकी हुई पीठ
मुझे मायूस करने के लिए
काफी है।
झुकी हुई पीठ
धीरे-धीरे
स्क्रीन के भीतर घुस रही है
जैसे रीढ़ की हड्डी
अब शरीर का नहीं
नेटवर्क का हिस्सा हो।
चेहरों पर रोशनी है
पर आँखों में अंधेरा
इतना स्थिर है
कि उसमें कोई भी
अपना नाम लिख सकता है
और मिटा सकता है।
वे हँसते हैं
बिना आवाज़ के
उनकी उंगलियाँ
चीखती रहती हैं
कमेंट बॉक्स में
जहाँ हर शब्द
एक पत्थर है
जो किसी और की खिड़की पर नहीं
अपने ही भीतर गिरता है।
मैंने देखा है
एक आदमी को
जो दिनभर
लोगों को हँसाता था
रात को
अपनी प्रोफाइल से बाहर निकलकर
खुद को खोजता था
पर हर बार
“यूजर नॉट फाउंड”
लिखा आता था।
यह शहर
अब नक्शे में नहीं मिलता
यह ऐप्स में बसता है
जहाँ रास्ते
एल्गोरिदम तय करते हैं
और मोड़ पर खड़ा हर इंसान
एक डेटा है
जिसे पढ़ा जा चुका है।
नींद
अब शरीर की जरूरत नहीं
एक फीचर है
जिसे लोग
स्किप कर देते हैं
जैसे विज्ञापन।
और सपने
किसी पुराने वर्ज़न की तरह
धीरे-धीरे
अनइंस्टॉल हो रहे हैं।
मैंने कई बार
अपने ही हाथों को
मोबाइल से अलग करने की कोशिश की
पर वे
मेरे नहीं रहे
उनमें कंपन था
जो मेरे दिल से नहीं
किसी और सर्वर से आ रहा था।
उस दोस्त की याद
अब भी आती है
जिसने सिक्का उछाला था
वह शायद जीत गया होगा
या हार गया होगा
पर सच यह है
कि अब
सिक्के के दोनों पहलू
एक जैसे दिखते हैं।
यहाँ
कोई मरता नहीं
बस ऑफलाइन हो जाता है
और लोग
कुछ देर तक
उसकी आखिरी सीन देखते हैं
फिर आगे बढ़ जाते हैं।
मैं अब भी गुजरता हूँ
उसी शहर से
जहाँ कोई नहीं रहता
और हर बार
मुझे लगता है
कि इस बार
शायद कोई पुकारेगा
मेरा नाम—
पर
आवाज़
नोटिफिकेशन में बदल जाती है
और मैं
फिर से
जिंदा होने का सबूत
ढूंढने लगता हु।
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