Hindi Quote in Poem by Anup Gajare

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"एक दोपहर"
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दोपहर के भीतर
बसी लू हवाएं
बहते हुए
बादल की तरफ देख रही थी।

बरगद की घनी
छांव में दो भेड़े
आपस में बहस में
जूझी थी।

ग्राउंड की धूल
भरी सतह पर
चलता हुआ एक तारा
ताक रहा था
सायकल पर जा रही
चांदनी को।

पेड़ो की झुरमुट में
पंछी छोड़ रहे थे
अपने पुराने घोंसलों को।

चाय के ठेले पर
हर रोज की तरह
ही भीड़ उमड़ आई थी।

बंद पड़े जीर्ण
थियेटर में ऊब
चुके थे पोस्टर।

कही लकड़हारे
कांट रहे थे जिंदा
वृक्ष से भरी छांव को।

तो कही भरे बाजार
में प्याज, लहसुन बिक
रहे थे चांदी के भाव।

पेट्रोल पंप पर
लाइन में खड़ा
कोई आम इंसान
दूसरे इंसान से
देश के भविष्य पर
बातों में उलझा था।

किसी अज्ञात मकान
कि दीवार पर आलस दे रही थी
बिल्ली,

कुत्ता इंतजार में था
बिल्ली फर्श पर कब उतरेगी
उसके दांतों की कटकट
मुंह से रीसती लार में
असंख्य सूक्ष्म जीव
अपने ब्रह्मांड को
नष्ट होते देख रहे थे।

दोपहर अपने गर्भ में
बहुत कुछ समेटे हुए
सूरज को दोष दे रही थी।

एक स्थान रिक्त था
जहां अवकाश में
किसी का न होना ही
उसका होना भी था।

बच्चे स्कूल जा रहे थे
बोझ को ढोते हुए
उनकी झुकी पीठ पर
प्रश्न ही सवार था,

गर्मी की छुट्टियों
में उन्हें नाना के घर
कोई ट्रेन नहीं ले जानेवाली थीं

मामा के घर
जानेवाली बंद पड़ी
रेल के आखरी डिब्बे में
कोई सिगरेट फूंक रहा था।

उसने आह भरी
और दोपहर की
गोद में सिर रखते हुए
आंखे भींच ली।

बूढ़ा अखबार के
अक्षरों को पढ़ रहा था

पढ़ रहा था
ये गर्मी अच्छी नहीं होती
युद्ध आखिरी समाधान नहीं
शायद
इस जाड़े के बाद युद्ध खत्म हो।

उसने चश्मा उतारा
और हथेली से
पसीने को पोंछते हुए
कुछ देर तक
अक्षरों के बिना
दुनिया को देखने लगा।

अक्षर अब भी
कागज पर थे
पर अर्थ
धीरे-धीरे
पिघलकर
दोपहर में घुल रहे थे।

पास ही
एक छाया
अपनी लंबाई मापते-मापते
थक चुकी थी,
वह सिकुड़कर
पांव के नीचे
आ बैठी—
जैसे किसी का
अधूरा विचार।

दूर कहीं
एक खिड़की
आधी खुली थी
आधी बंद,
उसके भीतर
एक स्त्री
नींद और जाग के बीच
फंसी हुई
अपने ही सपने का
दरवाजा खटखटा रही थी।

सपने के भीतर
कोई आवाज़ नहीं थी,
सिर्फ
एक सूखा हुआ पेड़
अपनी जड़ों से
आकाश को
खींचने की कोशिश कर रहा था।

और आकाश—
धीरे-धीरे
नीचे झुकता हुआ
धरती के कान में
कुछ कहना चाहता था,
पर शब्द
गर्मी में जलकर
राख हो चुके थे।

एक बच्चा
किताब के पन्नों के बीच
उंगली फंसाकर
सो गया था,
पन्ने हिल रहे थे—
जैसे हवा नहीं,
समय
उन्हें पलट रहा हो।

उसके सपने में
न कोई स्कूल था
न कोई सवाल,
सिर्फ एक खाली मैदान था
जहां
कोई उसे बुला नहीं रहा था।

दोपहर अब
धीरे-धीरे
अपने ही भार से
झुकने लगी थी,
सूरज
थोड़ा थककर
पीछे हट रहा था,
जैसे उसने भी
मान लिया हो
कि हर चीज़ को
जलाकर
समझा नहीं जा सकता।

एक अनदेखा क्षण
हवा में टंगा था—
जहां
न अतीत था
न भविष्य,
सिर्फ
एक हल्की-सी कंपन थी
जो बता रही थी
कि कुछ भी
स्थिर नहीं है।

और उसी कंपन में
कहीं बहुत भीतर
कोई
चुपचाप
दोपहर को छोड़कर
शाम की तरफ
चल पड़ा था।
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Hindi Poem by Anup Gajare : 112020323
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