बाज़ार में धर्म।
समस्या ए नहीं कि धर्म अब बाज़ार में है,
पीड़ा यह कि चेतना भी अंधे विचार में है।
अक्षरों के देवालय में सत्य की पूजा कम,
मिथ्या का दीप हर इक बड़े समाचार में है।
बोध के तरु बंजर, रस में अब माधुर्य नहीं,
जन-जन उपाधि के सब दंभ-प्रचार में है।
ग्रंथों को पढ़कर भी जो न समझे करुणा,
ऐसी शिक्षा तो केवल काग़ज़ी श्रृंगार में है।
आस्था का नाम लेकर जो सौदा रचता है,
वो साधु नहीं, ए अभिनय के व्यापार में है।
सत्य कहो तो कड़वाहट सी लगे जग को,
विष ही आजकल सारे मधुर व्यवहार में है।
“प्रसंग” ए कलम क्या लिखे इस दौर में,
सच जहाँ भी लिखा, वो दीवार में है।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर