नहीं जानूँ मैं,
कहाँ है तू,
कैसा है तू,
कहाँ रहता है,
क्या करता है…
बिल्कुल अजनबी है तू,
फिर भी न जाने क्यों
सोचती हूँ तेरे बारे में इतना…
क्यों देखती हूँ तेरे ख्वाब,
क्यों तेरे ख्यालों में
खुद से ही मुकर जाती हूँ…
अजीब सा रिश्ता है ये—
ना तेरा कोई नाम,
ना मेरा कोई हक़…
फिर भी दिल
तुझे अपना मान बैठा है…🌸