भीतर का अँधेरा।
भय नाम का चेहरा अब कोई सच नहीं है,
भीतर का अँधेरा भी उतना सच नहीं है।
कदम बाँधता साया ये अपने ही मन का,
राहों में कहीं भी कोई अवरोध नहीं है।
नज़रों ने खींचीं ये बंधन की लकीरें,
बाहर कहीं कोई दोहरी सरहद नहीं है।
सीने में अगर आग ज़रा-सी भी जले तो,
हर ख़ौफ़, हर इक तूफ़ान कुछ भी नहीं है।
कल का जो भय था, बस वहम ही ठहरा,
आने वाले लम्हों में वो बात नहीं है।
ख़ुद से जो भिड़ा, फ़तह उसी पर ही ठहरी,
बाहर कहीं कोई जंग का मैदान नहीं है।
‘प्रसंग’ कहे- ये ख़ौफ़ झूठी परछाईं,
आँखें जो खुलें तो इसमें भी दम नहीं है।
- प्रसंग
प्रणय राज रणवीर