वक़्त का फ़ैसला
अपनी सूरत पे यूँ इतराना ठीक नहीं,
आईना यूँ कभी बहक जाना ठीक नहीं।
वक़्त के हाथ में सब राज़ लिखे होते,
आज हँसना है तो कल रोना ठीक नहीं।
रंग-ओ-रूप, दौलत, धूप-छाँव जैसे हैं,
इन पे मन का यूँ भरम खाना ठीक नहीं।
जो भी पाया है, वो बस दो पल का मेला है,
इस मेले में ख़ुद को खो जाना ठीक नहीं।
मिट्टी से उठकर फिर मिट्टी में मिलना है,
इस सच्चाई को यूँ झुठलाना ठीक नहीं।
नर्म लफ़्ज़ों में भी सच बोला जाता है,
हर सच को यूँ तलवार बनाना ठीक नहीं।
‘प्रसंग’ कहे, ये दुनिया फ़ानी मंज़र है,
इस पर इतना दिल बहलाना ठीक नहीं।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर