"उदास लड़का"
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बेंच पर अक्षर उकेरता
उदास लड़का
मुझे गुफाओं के प्राचीन
सभ्यता कि याद में डुबो देता है।
मैं उसका बनाया हुआ
आडा टेढ़ा आदम हु
जो ईव्ह के लिए
फल तोड़ता है।
लड़का ट्रेन में बैठा
खिड़की से भागते पेड़ो में
सिहरन ढूंढ लेता है
उसके दुबके हुए
किसी अंधेरे कोने का
हिस्सा मैं हु।
प्रतीक्षा ही प्रेम है
उसने बहुत प्रेम किया
और युद्ध के समाचार
पढ़ते हुए आह भरी।
उसकी प्रिय
ईरान के किसी गांव में
अपने पति के आने का
इंतजार करती रही।
अमेरिका रावण का
ग्यारहवां मस्तिष्क बन
रहा था
तब उदास लड़का किसी
आदमी को अखबार में देखते
हुए गालियां देता हुआ दिख पड़ा।
गालियां पुरातन है
युद्ध से भी पहले
इनका सृजन हुआ था
लड़का मुझे रेल
में बोझ की तरह उकेरता
हवा में प्रिय का हिस्सा बो रहा था।
मैं इतिहास में फैला
ऐसे कितने लड़कों
को पहचानता था
जिन्होंने अपनी
प्रेमिका बुझा दी
किसी दूसरे के युद्ध में
हारे हुए बेबस लड़के
मैं देखता आया हु।
और वे लड़के
अक्सर लौटते नहीं थे
सिर्फ उनके नाम
किसी पत्थर पर
गलत वर्तनी में उकेर दिए जाते थे।
उनकी जेबों में रखे
अधूरे खत
किसी संग्रहालय की
धूल बन जाते थे
जहां प्रेम
इतिहास की वस्तु बनकर
कांच के पीछे सांस लेता है।
मैंने देखा है
उनके हाथों की लकीरों में
रेत भर जाती है
और समय
उन्हें पढ़ने से इंकार कर देता है।
उदास लड़का अब भी
ट्रेन की उसी सीट पर बैठा है
जहां से बाहर का संसार
पीछे भागता रहता है
और भीतर
सब कुछ ठहरा हुआ है।
उसकी आंखों में
कोई युद्ध समाप्त नहीं होता
हर शाम
एक नई हार
उसके भीतर जन्म लेती है।
वह प्रेम को
किसी पुरानी भाषा की तरह
याद करने की कोशिश करता है
जिसके शब्द
अब किसी भी मुंह से
सही उच्चारण में नहीं निकलते।
कभी-कभी
वह अपना नाम भूल जाता है
और खुद को
किसी मरे हुए सैनिक की जगह रख देता है
जिसकी पहचान
सिर्फ एक संख्या थी।
मैं
उसकी उंगलियों के बीच
फंसा हुआ समय हूं
जो हर उकेरी गई रेखा के साथ
थोड़ा और टूटता जाता है।
और जब वह
आखिरी बार
बेंच पर झुककर लिखता है—
तो अक्षर नहीं
बल्कि एक शून्य उभरता है
जिसमें
ना आदम बचता है
ना ईव्ह
ना प्रेम
ना प्रतीक्षा—
सिर्फ एक लड़का
जो इतिहास में कहीं
गलती से
जिंदा रह गया।
मुर्दों से भरी
ट्रेन में अकेला
जिंदा लड़का
जीवट उदास लड़का।
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