"दोनों"
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दोनों घूम रहे थे
शाम के निर्जन स्थल पर
उसके गर्म तलवे पर
उंगलियों को घुमाते हुए
वह चल रहा था।
इतना अंतर
नापने के बाद
दोनों को अंधेरे में
अपने ही सौरमंडल का
आंगन न दिखा।
वे टूटे हुए
बस आगे बढ़ रहे थे
जीवन की नींव रखने के लिए
उन्हें किसी फरिश्ते ने नहीं
भेजा था कही।
सदियों पहले
घटित हुआ था
कि उसने नकार दिया
उसके अस्तित्व को।
आश्वासन देते हुए
उसने शाम बीता दी
रात के दूसरे पहर
उसने दूसरे तारे को
उसके ब्रह्मांड में
रिसीव किया।
आकाशगंगा की खिड़की से
जन्मदाता देख रहा था
दोनों को बिखरते हुए।
फिर
शायद
दोनों कभी न मिलने की शर्त पर
जुदा हुए।
पर शर्तें
समय को याद नहीं रहतीं।
वह
किसी अनजान ग्रह पर
धीरे-धीरे बूढ़ा होता रहा,
जहाँ गुरुत्वाकर्षण
उसके दुख से हल्का था।
और वह—
एक तारे के भीतर
जलती रही,
अपनी ही रोशनी से
अंधी होती हुई।
कभी-कभी
किसी टूटते उल्कापिंड की तरह
उनकी स्मृतियाँ
एक-दूसरे की दिशा में गिरतीं,
पर
मध्य में फैला निर्वात
हर बार
उन्हें निगल लेता।
जन्मदाता अब भी
आकाशगंगा की उसी खिड़की पर था,
पर उसकी आँखों में
अब पहचान नहीं थी—
सिर्फ गणना थी
दूरी की,
और क्षय की।
एक दिन
जब समय ने
अपनी ही परछाईं को पार किया,
दोनों ने
अलग-अलग ब्रह्मांडों में
एक ही सपना देखा—
कि वे फिर मिलेंगे
किसी ऐसे स्थान पर
जहाँ
न सौरमंडल होगा,
न तारे,
न कोई देखने वाला।
सिर्फ
एक अधूरा स्पर्श
जो
कभी हुआ ही नहीं।
और उसी अधूरेपन में
उन्होंने
अपना अस्तित्व
पूरा मान लिया।
बिछड़े हुए तारे
टूटती प्रकाश शलाकों से
अब बात नहीं करते।
इसलिए दो
अलग होने के बाद
एक दूसरे का अक्ष छू न सके कभी।
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Anup Ashok Gajare