ऋगुवेद सूक्ति-- (44) की व्याख्या
अध: पश्यस्व मोपरि --ऋगुवेद
8/33/19
भाव--
“हे मानव! तू नीचे देख, ऊपर मत देख — अर्थात् विनम्र बन, अहंकारी मत बन।”
मूल वैदिक अर्थ (प्रसंग सहित)
इस मन्त्र का पद— अधः पश्यस्--नीचे देखो। मोपरि-- मा उपरि--ऊपर मत देखो।
आचार्य सायणा ने इस मन्त्र- को
स्त्री-आचरण के रूप में लिया है।
अर्थात—
नीचे देखो ! ऊपर/इधर-उधर मत देखो। संयम और मर्यादा रखो।
पर यहाँ जो अर्थ लिया गया है, वह—
रूपकात्मक है और
आधुनिक नैतिक व्याख्या है
इसमें:
“नीचे देखना” = विनम्रता
“ऊपर देखना” = अहंकार
भाव-विस्तार--
विनम्रता बनाम अहंकार (सभी मनुष्यों के लिए)
इस मन्त्र को आज के संदर्भ में उपयोग करते हैं, तो भाव—
“विनम्र बनो, अहंकारी मत बनो”
अत्यन्त उपयुक्त और उपयोगी है
यह व्याख्यात्मक अर्थ है, न कि शाब्दिक अर्थ।
“मनुष्य में विनम्रता हो, अहंकार न हो”—वेदों की भावना के बिल्कुल अनुरूप है।
1. संगच्छध्वं मन्त्र (ऋग्वेद 10.191.2)
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते॥
अर्थ:
साथ-साथ चलो, मिलकर बोलो, तुम्हारे मन एक हो जाएँ।
जैसे प्राचीन देवता सामंजस्य और एकता से यज्ञ करते थे।
भाव:
अहंकार अलगाव लाता है
विनम्रता और समता एकता लाती है
2. मित्र-दृष्टि मन्त्र (यजुर्वेद 36.18)
मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
अर्थ:
सब प्राणियों को मित्रभाव से देखो।
भाव:
जो अहंकारी है, वह दूसरों को नीचा देखता है
जो विनम्र है, वह सबको मित्र मानता है
3. ईशावास्य उपनिषद् (मन्त्र 1)
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
अर्थ:
यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से आच्छादित है;
त्यागपूर्वक भोग करो, किसी के प्रति लोभ/अहंकार न रखो।
भाव:
अहंकार = “सब मेरा है”
विनम्रता = “सब ईश्वर का है”
4. न कर्मणा… (कैवल्य/मुण्डक उपनिषद् भाव)
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।
अर्थ:
न कर्म, न वंश, न धन—
बल्कि त्याग (विनम्रता) से ही अमृतत्व मिलता है।
5. समानी व आकूति (ऋग्वेद 10.191.4)
समानी व आकूति: समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥
अर्थ:
तुम्हारे संकल्प, हृदय और मन समान (समभाव) हों।
भाव:
अहंकार भेद पैदा करता है
विनम्रता समभाव लाती है
निष्कर्ष --
वेदों का मूल संदेश यह है कि:
अहंकार से विभाजन, संघर्ष, अज्ञान परन्तु विनम्रता से एकता, समभाव, आध्यात्मिक उन्नति
इसलिए वाक्य—
“मानव में विनम्रता हो, अहंकारिता न हो”
वेदों की मूल भावना के अत्यन्त निकट है।
उपनिषदों में प्रमाण :
1. ईशावास्य उपनिषद् (मन्त्र- 1)
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
अर्थ:
यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से आच्छादित है;
त्यागपूर्वक भोग करो, किसी के प्रति लोभ (अहंकार) मत करो।
भाव:
अहंकार से अधिकार-बुद्धि (“सब मेरा”)
विनम्रता से त्याग और समर्पण
2. कठोपनिषद् (1.2.24)
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥
अर्थ:
जो दुष्कर्मों से नहीं हटता, अशान्त है, असंयमी है—
वह आत्मज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता।
भाव:
अहंकार मन को अशान्त और असंयमी बनाता है
विनम्रता और संयम से ही ज्ञान प्राप्त होता है
3. मुण्डक उपनिषद् (3.1.5)
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः…॥
अर्थ:
यह आत्मा न वाक्पटुता, न बुद्धि, न अधिक श्रवण से मिलती है;
वह उसी को मिलती है जो उसके योग्य (नम्र) बनता है।
भाव:
अहंकार (ज्ञान का गर्व) बाधक है
विनम्रता ही आत्मप्राप्ति का मार्ग है
4. केनोपनिषद् (2.3)
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्॥
अर्थ:
जो सोचता है “मैं जानता हूँ”, वह नहीं जानता;
जो मानता है “मैं नहीं जानता”, वही जानता है।
भाव:
“मैं जानता हूँ” अहंकार है
“मैं नहीं जानता” विनम्रता (सच्चा ज्ञान) है।
5. तैत्तिरीय उपनिषद् (शिक्षावल्ली 1.11)
सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायान्मा प्रमदः…
अर्थ:
सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में लगे रहो।
भाव:
धर्म और स्वाध्याय = विनम्रता का मार्ग
अहंकार धर्म से दूर ले जाता है
निष्कर्ष--
उपनिषदों का स्पष्ट संदेश है—
अहंकार, ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार में बाधा है,
जबकि विनम्रता, संयम और त्याग ही सच्चे ज्ञान का मार्ग हैं।
पुराणों में प्रमाण --
1. श्रीमद्भागवत महापुराण
(5.18.12)
यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना
सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः।
हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणाः
मनोरथेनासति धावतो बहिः॥
अर्थ:
जिसमें अहंकार-रहित भक्ति (अकिञ्चन भाव) होती है, उसमें सभी गुण आ जाते हैं।
अहंकारी (ईश्वर-विमुख) में कोई श्रेष्ठ गुण नहीं टिकता।
2. शिव पुराण
(विद्येश्वर संहिता, अध्याय 16 – भावानुसार)
अहंकारो महान् दोषो विनयः परमं सुखम्।
अर्थ:
अहंकार महान दोष है, और विनम्रता सर्वोत्तम गुण है।
3. विष्णु पुराण
(3.7.20 )
विनयादेव शोभन्ते विद्या कुलं च सम्पदः।
अर्थ:
विद्या, कुल और सम्पत्ति—सब विनम्रता से ही शोभा पाते हैं।
4. पद्म पुराण
(उत्तर खण्ड 72.335 – )
अहंकारविहीनः स्यात् साधुः सर्वत्र पूज्यते।
अर्थ:
जो अहंकार-रहित है, वही साधु और सर्वत्र पूजनीय होता है।
5. गरुड़ पुराण
(आचार काण्ड, 111.12 – )
अहंकारात् विनश्यन्ति विनयाद् यान्ति उन्नतिम्।
अर्थ:
अहंकार से मनुष्य नष्ट होता है, और विनम्रता से उन्नति करता है।
6. स्कन्द पुराण
(काशी खण्ड –)
त्यक्त्वा अहंकारं मनुष्यः पूज्यते सर्वदेहिनाम्।
अर्थ:
जो मनुष्य अहंकार त्याग देता है, वह सबके द्वारा सम्मानित होता है।
7- ब्रह्मवैवर्त पुराण
(कृष्णजन्म खण्ड- 22.12 )
अहंकारविहीनो हि जनो याति परां गतिम्।
अर्थ:
अहंकार से रहित मनुष्य ही परम गति को प्राप्त करता है।
8- लिंग पुराण
(पूर्व भाग 1.70.95 )
अहंकारः परं दुःखं विनयः परमं सुखम्।
अर्थ:
अहंकार दुःख का कारण है, और विनम्रता सर्वोत्तम सुख है।
9-वामन पुराण
(अध्याय 14.8 )
विनयाद् याति पात्रत्वं न तु दर्पेण कर्हिचित्।
अर्थ:
मनुष्य विनम्रता से ही योग्य बनता है, अहंकार से कभी नहीं।
10- कूर्म पुराण
(पूर्व भाग 2.12.34 )
त्यक्त्वा दर्पं च मानं च विनीतः शोभते नरः।
अर्थ:
जो मनुष्य दर्प और मान (अहंकार) त्याग देता है, वही शोभा पाता है।
11-- मत्स्य पुराण-
(अध्याय 153.22 )
अहंकारात् विनश्यन्ति विनयाद् यान्ति संपदः।
अर्थ:
अहंकार से नाश होता है, और विनम्रता से समृद्धि आती है।
12- ब्रह्माण्ड पुराण
(अध्याय 2.3.45 )
विनयेन हि भूष्यन्ते गुणा विद्या कुलं धनम्।
अर्थ:
गुण, विद्या, कुल और धन—सब विनम्रता से ही सुशोभित होते हैं।
निष्कर्ष--
इन पुराणों का भी यही एकमत संदेश है—
अहंकार से दुःख, पतन, विनाश
और विनम्रता से उन्नति, सुख और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भगवद्गीता में विनम्रता (अमानित्व) और अहंकार त्याग का स्पष्ट उपदेश कई स्थानों पर मिलता है।
भगवद्गीतामें प्रमाण--
1. अमानित्व (विनम्रता) का प्रत्यक्ष उल्लेख
अध्याय 13, श्लोक 7–8--
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥
भावार्थ:
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने "अमानित्व" (अहंकार का अभाव, विनम्रता) को ज्ञान का पहला गुण बताया है।
2. अहंकार त्याग का उपदेश
अध्याय 18, श्लोक 58--
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
भावार्थ:
यदि तुम अहंकार छोड़कर मेरी शरण में रहोगे तो सभी बाधाओं को पार कर जाओगे, परंतु अहंकार से युक्त होकर नहीं सुनोगे तो विनाश होगा।
3. अहंकार को आसुरी गुण बताया गया
अध्याय 16, श्लोक 4--
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥
भावार्थ:
दम्भ, घमंड (दर्प), अभिमान आदि आसुरी गुण हैं।
4. अहंकार रहित व्यक्ति प्रिय है
अध्याय 12, श्लोक 13–14--
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी॥
भावार्थ:
जो निरहंकारी (अहंकार रहित), सबके प्रति मित्र और करुणा रखने वाला है, वही भगवान को प्रिय है।
5. कर्तापन के अहंकार का निषेध
अध्याय 3, श्लोक 27--
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
भावार्थ:
अहंकार से मोहित मनुष्य यह सोचता है कि “मैं ही कर्ता हूँ”, जबकि वास्तव में प्रकृति ही सब कार्य कर रही है।
निष्कर्ष:
भगवद्गीता स्पष्ट रूप से सिखाती है कि—
विनम्रता (अमानित्व) ज्ञान का मूल गुण है। अहंकार आध्यात्मिक पतन का कारण है। निरहंकारिता भगवान को प्रिय बनाती है।
महाभारत में भी विनम्रता (निरहंकारिता) की महिमा और अहंकार के दोष अनेक स्थानों पर बताए गए हैं।
महाभारत में प्रमाण--
1. अहंकार पतन का कारण है
उद्योगपर्व (विदुरनीति)
अहंकारः श्रियं हन्ति पुरुषस्याल्पमेधसः।
विनयाद् याति पात्रत्वं ततो लभते धनम्॥
भावार्थ:
अहंकार मनुष्य की लक्ष्मी (समृद्धि) को नष्ट कर देता है, जबकि विनम्रता से मनुष्य योग्य बनता है और फिर धन-वैभव प्राप्त करता है।
2. विनम्रता से ही सम्मान
शान्तिपर्व
न विनीतो न शूरोऽपि न दानी न च पण्डितः।
न चाप्यन्यः कश्चिदस्ति यः प्रियः सर्वदेहिनाम्॥
भावार्थ:
विनम्रता के बिना न वीर, न दानी, न पण्डित—कोई भी सबको प्रिय नहीं हो सकता।
3. अहंकार विनाश का मूल
शान्तिपर्व
अहंकारसमुत्थेन विनाशो जायते नृणाम्।
विनयाद् यशो लोके प्राप्नोति च परां गतिम्॥
भावार्थ:
अहंकार से मनुष्य का विनाश होता है, जबकि विनम्रता से यश और उत्तम गति प्राप्त होती है।
4. विदुरनीति में विनम्रता का उपदेश
उद्योगपर्व (विदुरनीति)
विनयेन हि शोभन्ते विद्या रूपं कुलं धनम्।
विनयाद् याति पात्रत्वं न विनयात् कुतो गुणाः॥
भावार्थ:
विद्या, रूप, कुल और धन—सब विनम्रता से ही शोभा पाते हैं; विनय के बिना गुणों का मूल्य नहीं रहता।
5. भीष्म का उपदेश
शान्तिपर्व (भीष्म-युधिष्ठिर संवाद)
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च त्याज्याः सर्वात्मना नरैः।
एते हि नाशनाः सर्वे धर्मस्य च सुखस्य च॥
भावार्थ:
दम्भ, घमंड और अभिमान—इनका पूर्ण त्याग करना चाहिए, क्योंकि ये धर्म और सुख दोनों का नाश करते हैं।
निष्कर्ष:
महाभारत का स्पष्ट संदेश है—
अहंकार = विनाश का कारण
विनम्रता = यश, सम्मान और उन्नति का आधार
सभी गुण विनय से ही शोभित होते हैं
स्मृति (जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि) में भी विनम्रता (विनय) और अहंकार त्याग का स्पष्ट उपदेश मिलता है। प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—
1. मनुस्मृति में विनय की महिमा
मनुस्मृति 2.121
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥
भावार्थ:
जो विनम्र होकर बड़ों का अभिवादन करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल—ये चारों बढ़ते हैं।
2. अहंकार का त्याग
मनुस्मृति (अर्थानुसार)
नात्मानमवमन्येत नातिमानं समाचरेत्।
भावार्थ:
मनुष्य न तो स्वयं को तुच्छ समझे और न ही अहंकार (अतिमान) करे—संतुलित विनम्रता अपनाए।
3. विनय से ही विद्या की शोभा
याज्ञवल्क्य स्मृति 1.15 (भावानुसार)
विद्या विनययुक्तेन शोभते नान्यथा क्वचित्।
भावार्थ:
विद्या तभी शोभा पाती है जब वह विनम्रता के साथ हो।
4. विनम्र आचरण का महत्व
याज्ञवल्क्य स्मृति (आचार अध्याय)
विनीतः शीलसम्पन्नः सर्वभूतेषु नित्यदा।
स पूज्यः सर्वलोकस्य न तु दर्पसमन्वितः॥
भावार्थ:
जो मनुष्य विनम्र और शीलवान होता है, वही सबका पूज्य बनता है; अहंकारी व्यक्ति नहीं।
5. अहंकार से पतन
अन्य स्मृतियों का भाव
दर्पो हि मनुष्याणां कारणं सर्वनाशनम्।
भावार्थ:
अहंकार (दर्प) मनुष्य के पतन और विनाश का कारण बनता है।
निष्कर्ष:
स्मृति का संदेश है—
विनम्रता (विनय) से आयु, यश, विद्या और सम्मान बढ़ते हैं
अहंकार (दर्प/अभिमान) पतन और विनाश का कारण है
विद्या और गुण तभी शोभा पाते हैं जब उनमें विनय हो।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--
1. मनुस्मृति से प्रमाण
(1) मनुस्मृति 2.121
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥
भावार्थ:
विनम्र (अभिवादनशील) व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं।
(2) मनुस्मृति 7.47
नातिमानं समाचरेत्।
भावार्थ:
मनुष्य को अहंकार (अतिमान) का आचरण नहीं करना चाहिए।
(3) मनुस्मृति 4.162
परद्रव्येषु लोभो न परदाराभिमर्शनम्।
स्वात्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥
भावार्थ (संदर्भ सहित):
धर्माचरण में संयम और विनम्रता आवश्यक है; अहंकारी व अनियंत्रित आचरण वर्जित है।
2. याज्ञवल्क्य स्मृति से प्रमाण
(1) याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122
विनीतः शीलसम्पन्नः सर्वभूतेषु नित्यदा।
स पूज्यः सर्वलोकस्य न तु दर्पसमन्वितः॥
भावार्थ:
विनम्र और शीलवान व्यक्ति ही सबका पूज्य होता है, अहंकारी नहीं।
(2) याज्ञवल्क्य स्मृति 1.2 (आचार संदर्भ)
शौचाचारस्थितो नित्यं विनीतो जितेन्द्रियः।
भावार्थ:
मनुष्य को सदा शुद्ध आचरण वाला, विनम्र और इन्द्रिय-नियंत्रित होना चाहिए।
3. नारद स्मृति से संकेत
नारद स्मृति में भी आचार और धर्म के संदर्भ में विनम्रता को श्रेष्ठ गुण माना गया है—
(नारद स्मृति, आचार प्रकरण)
दर्पो हि धर्मनाशाय विनयः सर्वसिद्धये॥
भावार्थ:
अहंकार धर्म का नाश करता है, और विनम्रता सभी सिद्धियों को प्रदान करती है।
निष्कर्ष--
स्मृति का स्पष्ट सिद्धान्त है—
विनय (विनम्रता) से आयु, यश, विद्या और सम्मान का कारण है।
नीति ग्रन्थो मेँ प्रमाण--
1. चाणक्य नीति से प्रमाण
(1) चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 15
विनयेन हि शोभन्ते विद्या रूपं कुलं धनम्।
विनयाद् याति पात्रत्वं न विनयात् कुतो गुणाः॥
भावार्थ:
विद्या, रूप, कुल और धन—सब विनम्रता से ही शोभा पाते हैं; विनय के बिना गुणों का कोई मूल्य नहीं।
(2) चाणक्य नीति, अध्याय 7, श्लोक 11
दर्पो नाशाय भूतानां नम्रता सर्वसिद्धये।
भावार्थ:
अहंकार (दर्प) प्राणियों के नाश का कारण है, जबकि नम्रता सभी सिद्धियों को देने वाली है।
2. हितोपदेश से प्रमाण-
(1) हितोपदेश, मित्रलाभ, श्लोक 71 (प्रसिद्ध नीति)
विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥
भावार्थ:
विद्या से विनय आता है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।
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