Hindi Quote in Poem by Anup Gajare

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"दरिद्रता के स्वामी"
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दरिद्रता हंसी से बहुत डरती है
हंसी दब जाती है
मूर्ख सत्ता के सामने।

पुरानी प्रेमिकाओं के पास
लौटना चाहता है
कुछ बचा न हो तो
खोए अतीत से
प्रेम ही बुलाता हैं।

डर संक्रामक है
प्रेम नहीं
अगर प्यार बांटने से बढ़ता
तो कैस यू दरबदर न घूमता
उसे पत्थरों से चन्नी न किया जाता।

सत्ता हमेशा ही
गरीबी रेखा से
होते हुए अपना उपदेश पूरा करती हैं।

और गरीबी क्या है
बस सोच नहीं
बल्कि उससे भी
पुरातन विचार है।

दो ही वर्ग
प्यासे रहते हैं
कॉमन आदमी
का ग्लास हमेशा
भूखा होता है
आधा भरा हुआ।

भिक्षा मांगता साधु
ही इस देश का भविष्य है,था और रहेगा।

आजादी किस क़ीमत
पर मिली है
या उसका भी कोई मूल्य होता है
जिसे कभी ग़रीब इंसान खरीद नहीं पाता।

मैं सार्वजनिक हु
या मुझे सार्वजनिक
ही होना चाहिये
इसका फैसला कौन करता है?

कौन मुकदमा लड़ता है
इस कोर्ट में
कई पीड़ाएं है
जिन्होंने पवित्र ग्रंथो पर
हाथ के तलवे रखते हुए
उस अलाव से गर्मी प्राप्त की है
गर्मी प्राप्त की है
गर्मी के मौसम में।

सर्द रेत पर
तड़पती मछली
समुद्र में डूबे
दिन से पूछती है
की इतनी मंहगाई क्यों?

क्या होना ही बचा रहेगा
अंतिम श्वास में
बस कर्म ही जोता जाएगा
या फल का भी सृजन
हो सकता है।

कितनी बरबादी दरिद्रता में
फैली है
इसका हिसाब इस देश की अर्थव्यवस्था
अपने मार्च के बजट में जोड़ती क्यों नहीं।

कुपोषित बच्चों के लिए
ही मैं कविता के पौधें लगता हु
उनको बारिश भी गिला नहीं करती।

सड़न भरी दुर्गंधी
में बोझ तले खामोश
लकीरें खींचता रहा हु
उनका कोई मतलब नहीं।

तूम परेशान मत करना
हलाहल काफी है
नील कंठ अब और झेल नहीं सकता।

शब्दों की थाली में
रखे थे कुछ सत्य
पर भूख इतनी थी
कि झूठ ही पहले खा लिया गया।

रात के अंधे कुएँ में
झांकता रहा चाँद
उसे भी डर था
कि कहीं उसकी रोशनी
कर्ज़ में न बदल दी जाए।

किसी ने कहा—
उम्मीद अभी जिंदा है
मैंने देखा
वो आईसीयू में पड़ी थी
और ऑक्सीजन सिलेंडर
नीलामी में बिक चुका था।

सवालों की भीड़ में
एक उत्तर नंगा खड़ा था
उसने कपड़े नहीं पहने
क्योंकि सच को
ढकने के लिए
अब कोई धर्म नहीं बचा था।

भीख में मिली मुस्कान
ज़्यादा ईमानदार थी
उन हंसीयों से
जो सत्ता के गलियारों में
सैलरी पर रखी गई थीं।

किताबों के पन्नों पर
इतिहास चिल्लाता रहा
पर वर्तमान ने
अपने कानों में
विकास का ईयरफोन लगा लिया।

मिट्टी के घरों में
अब भी सपने पकते हैं
पर शहर की आग में
उनकी खुशबू
पहले ही जल जाती है।

मैंने देखा—
एक बच्चा भूखा था
पर उसके आँसू
सरकारी आँकड़ों में
कभी शामिल नहीं हुए।

वो जो आंकड़े बनाते हैं
उन्हें भूख नहीं लगती
शायद इसलिए
उनकी भाषा में
रोटी का कोई पर्याय नहीं होता।

कौन तय करेगा
कि दर्द कितना वैध है?
क्या कोई मीटर है
जिससे नापा जा सके
गरीबी का तापमान?
या फिर
हर बार की तरह
इसे भी
एक योजना में बदल दिया जाएगा
जिसका उद्घाटन
किसी अमीर के हाथों होगा।

मैंने अपने भीतर
एक अदालत बनाई थी
जहाँ न्यायाधीश भी मैं था
और अपराधी भी
पर सज़ा हमेशा
गरीबी को ही मिली।

वो जो नीलकंठ है—
अब चुप नहीं है
उसके गले में फंसा ज़हर
धीरे-धीरे
आवाज़ बन रहा है।

और जब वो बोलेगा—
तो शायद
आकाश भी
अपना रंग बदल लेगा।

पर तब तक…
दरिद्रता के स्वामी
अपनी गद्दी पर बैठे रहेंगे
और हम
अपनी ही ज़िंदगी की
याचिका लिखते रहेंगे।
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Hindi Poem by Anup Gajare : 112019728
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