जिम्मेदार कौन है।
थाली में नहीं रोटी, ये कैसा विकास है,
सत्ता के हर चेहरे पर फरेब का लिबास है।
सच बोलो तो लगते हो तुम गुनहगार यहाँ,
धूर्तों के लिए हर तरफ़ खुल्ला निवास है।
कानून भी बिकता है, कुर्सी भी नीलाम हुई,
इंसाफ़ का इस दौर में बस नाम ही पास है।
जो चुप है तमाशा देख, वो भी तो शरीक बना,
मौन हर इक शख़्स ही चलती हुई लाश है।
हक़ माँगते हो लेकिन फ़र्ज़ों से भागे फिरो,
ये भीड़ नहीं जागी, सोया हुआ समाज है।
अब आग बनो सीने में, डर भी जला दो सभी,
ये वक्त नहीं सोच का, सीधा प्रहार है।
“प्रसंग” अब उठ, सच को ज़ुबाँ से पुकार तू,
मौन रहा तो तू खुद ही गुनहगार है।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर