सवालों का मौसम
जलते सच पर कड़ा पहरा लगा बैठा है,
हर तरफ़ झूठ का चेहरा बना बैठा है।
संसदों में अजब सन्नाटा पसरा देखो,
सच कहे जो वही मुजरिम बना बैठा है।
रोटियों के लिए लोग भटकते फिरते,
कोई महलों में जश्न सजा बैठा है।
आँख पर पट्टियाँ थीं तो शिकायत कम थी,
अब तो इंसाफ़ भी खुद को बेचता बैठा है।
मंदिरों में भी सियासत का ज़हर है,
आदमी आदमी से फ़ासला बना बैठा है।
कागज़ों पर तरक़्क़ी के नए रंग चढ़े,
ख़्वाब हर एक ज़मीं पर मरा बैठा है।
जो चला था सच की वो मशाल लेकर,
डर के साए में चुपचाप छिपा बैठा है।
कुर्सियों के लिए रोज़ उसूलों का सौदा,
हर कोई अपना ईमान बेचता बैठा है।
लफ़्ज़ में आग भर दे तू “प्रसंग” अब तो,
वक़्त तुझसे भी कड़े सवालात लिए बैठा है।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर