"बचा हुआ समय"
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हम रहते हैं
एक गहरे नीले रंग के कमरे में—
इतना गहरा
कि उसकी दीवारें
धीरे-धीरे ब्रह्मांड की ओर खुलती लगती हैं।
वहाँ
पुंज-पुंज आलोक तैरता है
जैसे किसी अदृश्य बंसी से
टूटकर गिरती हुई
वासुदेव की ध्वनि।
बाहरी दुनिया
और भीतरी दुनिया के बीच
कोई दीवार नहीं बची अब—
जो है
सब भीतर है,
और जो भीतर है
वही बाहर फैलता जाता है।
हमसे पूछो तो
रोग, शोक, मृत्यु, दुःख, जरा, व्याधियां
किसी दूर ग्रह की खबर जैसे लगते हैं—
जैसे किसी ने
कभी हमें छुआ ही नहीं।
फिर भी
कभी-कभी
गुलाब की एक पंखुड़ी
अचानक स्मृति में गिरती है,
और फफूँद की गंध
अंधेरे में एक सफेद रास्ता बना देती है।
तब याद आता है—
दर्द और दर्द
दो अलग चीज़ें नहीं,
वे एक ही वृक्ष की
दो उलझी हुई जड़ें हैं
जो हमारे भीतर
धीरे-धीरे बढ़ती रहती हैं।
हमारा मर्म
कोई चीख नहीं है—
वह एक शिल्प है
जिसे समय
अपने अदृश्य औज़ारों से
तराशता रहता है।
हमने यह तय किया है—
किसी सभा में नहीं,
किसी शपथ के बिना,
बस चुपचाप
अपने ही भीतर।
कि
जो कुछ भी है
उसी के साथ बीत जाएगा जीवन—
यह नीला कमरा,
यह मौन,
यह अनगिनत रोशनियाँ।
और जब
आख़िरी क्षण बचेगा
तो शायद हम देखेंगे—
कि यह गहरा नीला रंग
असल में
ब्रह्मांड का खुला हुआ द्वार था,
और
पुंज-पुंज आलोक
सिर्फ़ समय नहीं था—
वह
बचा हुआ समय था
जो हमें
धीरे-धीरे
अनंत में लिख रहा था।
उसी समय में खुलता है
वह कमरा जिसका किराया
अबतक चुकाया न गया।
मकान मालिक नोटिस भेज रहा है
उन शब्दों को बांधकर
रखते हुए बूढ़े पीपल के नीचे
बैठे न जाने कितने जीव
अमीबा की तरह खीज रहे है।
चांद पर पैरों के निशान
किसने चांद को पीटा होगा
ये धब्बे कैसे
कितनी ये पीड़ा
इस हिंसा का कोई उत्तरदायित्व लेता क्यों नहीं।
अपने होने पर
बहुत कुछ सुंदर न रहा सियाह
गहरे फुसफुसाते हुए तारों में
क्या कोई वजूद था
ये कितनी रेत है
ब्रह्मांड के हर हिस्से में
मानव हमेशा कण रहा
किसी अज्ञात खोह में डूबी चेतना का।
आयाम में घूमने पर
समय भी था किसी
न पता आयाम की दीवार
उसमें लगी काई
जीवाणुओं को देखते हुए
निकलती रही न जाने कितनी यातना।
स्थल काल के
परे होकर कौन देखे बुद्धि
निर्णय कर नहीं सकती
बस घड़ी के काटे आवास में
उलझे रहते हैं
धूमकेतु में बनी गुफाओं में
पुरानी घड़ी बची होगी
सूरज ने उसकी बर्फ का अपहरण किया था
शायद
सूर्य सबसे प्राचीन शापित हाथों से बनी नौका था।
आपस में टकराते हुए
गुजर गए कितने पल
उनका संगीत आजकल
मुश्किल से कोई सुने।
सबसे ज्यादा देर
तब हो जाती है
जब काम शुरू होने से
पहले ही ख़त्म हो जाता है।
भीतर की सड़न
उलझे हुए बालों में
फंसी किसी याद की तरह
ज़हन के किनारे लगती रही
उसके आगे लिखे हुए शब्दों को
कोई प्रज्ञा पढ़ न सकी।
घड़ी की दुकानों में
घूमते हुए
किसी कारागीर के मैले हाथ देखने
की तमन्ना
कटे हुए टुकड़े उंगलियों में
हाथों से रिसता खून
पत्थर पर गिरते हुए
ही समय का निर्माण हुआ था कभी।
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