ऋगुवेद सूक्ति--(३७) की व्याख्या
"सत्या मनसो मे अस्ति"
ऋगुवेद--१०/१२८/४
भाव--मेरे मन के भाव सच्चे हों।
"सत्या मनसो मे अस्ति"
पदच्छेद--
सत्या । मनसः । मे । अस्ति ।
शब्दार्थ--
सत्या — सत्य, सच्चे, शुद्ध
मनसः — मन के (मन का)
मे — मेरे
अस्ति — हों / हैं
समष्टि अर्थ (भाव)--
मेरे मन के विचार सत्य और शुद्ध हों। सच्चे हों।
भावार्थ:
मेरे मन में जो संकल्प और भाव उत्पन्न हों, वे सत्य, शुद्ध और धर्मयुक्त हों।
संक्षिप्त व्याख्या:
इस ऋग्वैदिक प्रार्थना में साधक ईश्वर से यह कामना करता है कि उसके मन के विचार असत्य, कपट या दुष्टता से रहित हों। मन ही कर्मों का मूल है, इसलिए जब मन के संकल्प सत्य और पवित्र होते हैं, तब वाणी और कर्म भी सत्य मार्ग पर चलते हैं।
वेदों में यह सिद्धान्त बार-बार आता है कि—
पहले मन शुद्ध और सत्यनिष्ठ हो
फिर उसी से सत्य वाणी और सत्कर्म प्रकट हों।
इस प्रकार यह मंत्र मन की सत्यता, पवित्रता और सद्भावना की प्रार्थना है। वेदों में मन की सत्यता, शुद्ध संकल्प और सत्य विचार के विषय में कई स्थानों पर प्रमाण मिलते हैं।
वैदिक प्रमाण
१-ऋगुवेद--१०/१९१/४
समानो मन्त्रः समिति: समानी
समानं मनः सहचित्तमेषाम्।
भावार्थ:
सबका मंत्र (विचार) समान हो, सबका मन एक और शुभ संकल्प वाला हो।
२- यजुर्वेद --३४/१
तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।
भावार्थ:
मेरा मन सदैव शुभ और कल्याणकारी संकल्प वाला हो।
३. ऋगुवेद --१/८९/१
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।
भावार्थ:
हमारे पास सब ओर से कल्याणकारी और शुभ विचार आएँ।
४-अथर्ववेद--१९/९/१४
मंत्र:
शिवो मे मनः।
भावार्थ:
मेरा मन मंगलमय और कल्याणकारी हो।
इन वैदिक मंत्रों से स्पष्ट है कि वेदों में बार-बार मन की शुद्धता, सत्य विचार, और शुभ संकल्प की प्रार्थना की गई है।
यह भाव "सत्या मनसो मे अस्ति" मंत्र के समान है कि मन के विचार सत्य और पवित्र हों।
उपनिषदों में प्रमाण--
१-मुण्डक उपनिषद् -३/१)६
सत्यमेव जयते नानृतम्।
भावार्थ:
सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नही।
२-छान्दोग्य उपनिषद -३/१४/१
यथा क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति।
भावार्थ:
मनुष्य जैसा संकल्प और विचार करता है, वैसा ही वह बन जाता है।
३. अमृतबिन्दु उपनिषद --२
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ:
मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है।
४.बृहदारण्यक उपनिषद --४/४/५
स यथा कामो भवति तत्क्रतुर्भवति।
भावार्थ:
मनुष्य जैसा मन में संकल्प करता है, वैसा ही उसका कर्म और जीवन बन जाता है।
५. तैत्तिरीय उपनिषद--१/११/१
सत्यं वद, धर्मं चर।
भावार्थ:
सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो।
६. प्रश्न उपनिषद--१/१५
तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ:
जिन लोगों के जीवन में तप, ब्रह्मचर्य और सत्य प्रतिष्ठित होता है, वही ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं।
७. श्वेताश्वतर उपनिषद --२/१४
यदा चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
भावार्थ:
जब योग के द्वारा मन (चित्त) को शुद्ध और स्थिर किया जाता है, तब आत्मतत्त्व का ज्ञान होता है।
८. कठ उपनिषद-- १/३/३-४
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
भावार्थ:
शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है और मन लगाम है। मन को संयमित रखने से जीवन सही मार्ग पर चलता है।
९. केन उपनिषद --१/५
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
भावार्थ:
जिससे मन विचार करता है, उस परम तत्व को मन पूरी तरह जान नहीं सकता।
१०. कौषीतकि उपनिषद --३/२
प्राणो वा एष यः मनः।
भावार्थ:
प्राण और मन का गहरा संबंध है; मन ही चेतना का प्रमुख साधन है।
इन उपनिषदों के प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि मन की शुद्धता, सत्य संकल्प और संयम आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। यही सिद्धान्त वैदिक वाक्य “सत्या मनसो मे अस्ति” के भाव को भी पुष्ट करता है कि मन के भाव सत्य और पवित्र होने चाहिए।
पुराणों में प्रमाण--
१.पद्म पुराण --
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ:
मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है। यदि मन शुद्ध और सत्य भाव वाला हो तो मुक्ति का मार्ग खुलता है।
२. विष्णु पुराण--६/७/२८
सत्यं शौचं दया क्षान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्।
भावार्थ:
सत्य, शुद्धता, दया और क्षमा—ये सभी धर्म की साधना के मुख्य साधन हैं।
४. भागवत पुराण-- ११/१९/३६
सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिर्ह्रीः श्रीर्यशः क्षमा।
भावार्थ:
सत्य, पवित्रता, दया, संयम आदि गुणों से मनुष्य का जीवन श्रेष्ठ बनता है।
४--स्कंद पुराण --
न हि सत्यात्परो धर्मः।
भावार्थ:
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
५ गरुड़ पुराण--
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
भावार्थ:
सत्य के आधार पर ही पृथ्वी स्थित है और सत्य के प्रभाव से ही सूर्य तपता है।
६. अग्नि पुराण-
सत्यं धर्मस्य मूलं हि।
भावार्थ:
सत्य ही धर्म का मूल आधार है।
७--ब्रह्म पुराण --
सत्येन धार्यते धर्मः।
भावार्थ:
धर्म की स्थापना सत्य के आधार पर ही होती है।
८- वायु पुराण --
सत्यं परं नास्ति तपः।
भावार्थ:
सत्य से बढ़कर कोई तप नहीं है।
९. नारद पुराण--
सत्यं शौचं दया दानं धर्मस्य परमा गतिः।
भावार्थ:
सत्य, पवित्रता, दया और दान—ये धर्म के मुख्य मार्ग हैं।
१०-मार्कण्डेय पुराण --
न सत्यात्परमो धर्मः।
भावार्थ:
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
इन पुराणों के प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि सत्य और शुद्ध मन को धर्म का मुख्य आधार माना गया है। यही सिद्धान्त वैदिक वाक्य “सत्या मनसो मे अस्ति” (मेरे मन के भाव सत्य हों) के भाव को पुष्ट करता है।
भगवद्गीता में प्रमाण --
1. गीता --१७/१६
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
भावार्थ:
मन की प्रसन्नता, सरलता, मौन, आत्मसंयम और भावों की शुद्धि—ये सब मन का तप कहलाते हैं।
२-गीता--६/५
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
भावार्थ:
मनुष्य को अपने मन द्वारा ही अपना उत्थान करना चाहिए; मन ही मनुष्य का मित्र और शत्रु बनता है।
३. गीता-१६/१-२
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्॥
भावार्थ:
मन की शुद्धता, सत्य, शान्ति और सरलता दिव्य गुण हैं।
४. गीता- १०/४-५
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।
भावार्थ:
सत्य, ज्ञान, संयम आदि श्रेष्ठ गुण भगवान से ही उत्पन्न होते हैं।
इन गीता के श्लोकों से स्पष्ट है कि मन की शुद्धता, सत्य भाव और संयम आध्यात्मिक जीवन के लिए आवश्यक हैं। यही सिद्धान्त वैदिक वाक्य “सत्या मनसो मे अस्ति” (मेरे मन के भाव सत्य हों) के भाव का समर्थन करता है।
महाभारत मे प्रमाण--
१. शान्ति पर्व १६२/२१
न सत्यात्परमो धर्मो न सत्यात्परं तपः।
भावार्थ:
सत्य से बढ़कर न कोई धर्म है और न ही कोई तप।
२. अनुशासन पर्व -११३/२४
सत्यं हि परमं धर्मं सत्यं हि परमं तपः।
भावार्थ:
सत्य ही सर्वोच्च धर्म है और सत्य ही सर्वोच्च तप है।
३-शान्ति पर्व --१०९/११
मनसा चिन्तितं कर्म वचसा न प्रकाशयेत्।
भावार्थ:
मन के विचारों को शुद्ध और संयमित रखना चाहिए।
४. उद्योग पर्व--३३/६३
(विदुरनीति)
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
भावार्थ:
मनुष्य को सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए, पर अप्रिय सत्य भी नहीं बोलना चाहिए।
५. शान्ति पर्व --३२९/४०
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
भावार्थ:
सत्य के आधार पर पृथ्वी स्थित है और सत्य के प्रभाव से सूर्य तपता है।
इन श्लोकों से स्पष्ट है कि सत्य, शुद्ध मन और सत्य भाव को महाभारत में भी धर्म का मुख्य आधार बताया गया है, जो वैदिक वाक्य “सत्या मनसो मे अस्ति” के भाव का समर्थन करता है।
स्मृति-ग्रन्थों में प्रमाण--
१. मनु स्मृति --४/१३८
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ:
सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए; अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए और प्रिय असत्य भी नहीं बोलना चाहिए—यही सनातन धर्म है।
२-याज्ञवल्क्य स्मृति--१/१२२
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
भावार्थ:
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियों का संयम—ये धर्म के मुख्य लक्षण हैं।
३. नारद स्मृति-- १/१५
सत्यं धर्मस्य मूलम्।
भावार्थ:
सत्य ही धर्म का मूल आधार है।
४. पराशर स्मृति-- १/२४
सत्यं शौचं दया दानं धर्मस्य परमा गतिः।
भावार्थ:
सत्य, पवित्रता, दया और दान—ये धर्म के श्रेष्ठ मार्ग हैं।
५- दक्ष स्मृति-२/३
सत्यं हि परमं ब्रह्म।
भावार्थ:
सत्य को ही परम ब्रह्म कहा गया है।
इन स्मृति-ग्रन्थों के प्रमाणों से स्पष्ट है कि सत्य, शुद्ध मन और सच्चे भाव को धर्म का मूल आधार माना गया है। यही सिद्धान्त वैदिक वाक्य “सत्या मनसो मे अस्ति” (मेरे मन के भाव सत्य हों) के भाव का समर्थन करता है।
नीति-ग्रन्थों में प्रमाण--
१-चाणक्य नीति-- ३/१३
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वायवो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
भावार्थ:
सत्य से ही पृथ्वी धारण होती है, सत्य से सूर्य तपता है और वायु चलती है; सब कुछ सत्य पर ही स्थित है।
३- विदुर नीति-- ३३/६३ महाभारत, उद्योग पर्व )
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
भावार्थ:
मनुष्य को सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए।
३-शुक्र नीति-२/२०
सत्यं धर्मस्य मूलं हि।
भावार्थ:
सत्य ही धर्म का मूल आधार है।
४-भृतहरि नीति शतक-८४
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् धर्मं ब्रूयात् न चानृतम्।
भावार्थ:
मनुष्य को सत्य, प्रिय और धर्मयुक्त वचन बोलने चाहिए, असत्य नहीं।
५-सुभाषित रत्न-
न सत्यात्परमो धर्मः।
भावार्थ:
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
इन नीति-ग्रन्थों से स्पष्ट होता है कि सत्य और शुद्ध मन को जीवन का मुख्य धर्म और श्रेष्ठ आचरण माना गया है, जो वैदिक वाक्य “सत्या मनसो मे अस्ति” (मेरे मन के भाव सत्य हों) के भाव का समर्थन करता है।
हितोपदेश, पंचतंत्र और रामायण में प्रमाण--
१-हितोपदेश-१/२४
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
भावार्थ:
मनुष्य को सत्य और प्रिय वचन ही बोलने चाहिए।
२. पंचतंत्र-१/७८
न सत्यात्परमो धर्मो न सत्यात्परमं तपः।
भावार्थ:
सत्य से बढ़कर न कोई धर्म है और न कोई तप।
३-वाल्मीकि रामायण (अयोध्या काण्ड १०९/३४)
सत्यं हि परमं धर्मं धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ:
सत्य ही सर्वोच्च धर्म है और धर्म की प्रतिष्ठा सत्य में ही है।
४. वाल्मीकि रामायण (अयोध्या काण्ड २/३१)
रामो द्विर्नाभिभाषते।
भावार्थ:
श्रीराम एक बार जो वचन कहते हैं, उसे कभी बदलते नहीं—अर्थात् वे सत्यव्रती हैं।
५. अध्यात्म रामायण-२/७/१६
सत्यं शौचं दया शान्तिर्धर्मस्य परमा गतिः।
भावार्थ:
सत्य, पवित्रता, दया और शान्ति—ये धर्म के श्रेष्ठ लक्षण हैं।
इन ग्रन्थों से स्पष्ट है कि सत्य, शुद्ध मन और सत्य भाव को धर्म और आदर्श जीवन का मूल माना गया है। यह भाव वैदिक वाक्य “सत्या मनसो मे अस्ति” (मेरे मन के भाव सत्य हों) के सिद्धान्त को पुष्ट करता है।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में
प्रमाण--
१. गर्ग संहिता --१/३/२०
सत्यं धर्मस्य मूलं हि सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ:
सत्य ही धर्म का मूल है और सब कुछ सत्य पर ही आधारित है।
२. गर्ग संहिता-२/१५/३४
सत्यं शौचं दया शान्तिः साधूनां भूषणं परम्।
भावार्थ:
सत्य, पवित्रता, दया और शान्ति—ये सज्जनों के श्रेष्ठ आभूषण हैं।
३. योग वशिष्ठ-
(निर्वाण प्रकरण २/१८/२३)
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ:
मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है।
४-योग वशिष्ठ --
(उत्पत्ति प्रकरण १/७/८)
चित्तमेव हि संसारः तेन मुक्तं भवेच्चित्तम्।
भावार्थ:
चित्त ही संसार का कारण है; जब चित्त शुद्ध हो जाता है तो मुक्ति प्राप्त होती है।
५. योग वशिष्ठ
(निर्वाण प्रकरण २/१३/१२)
श्लोक:
शुद्धं मनः शान्तिमुपैति नित्यम्।
भावार्थ:
शुद्ध मन सदा शान्ति को प्राप्त करता है।
इन ग्रन्थों से भी स्पष्ट है कि सत्य, शुद्ध मन और पवित्र संकल्प को आध्यात्मिक जीवन का मूल माना गया है। यही सिद्धान्त वैदिक वाक्य “सत्या मनसो मे अस्ति” के भाव का समर्थन करता है।
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