मौन का राज़।
जो जानता है सो पहचानता, बताने की ज़रूरत क्या,
हक़ीक़त ख़ुद उजागर हो, जताने की ज़रूरत क्या।
भीतर जब उजियारा फूटे, मिट जाएगा ये भ्रम सारा,
सूरज को दीप दिखलाकर चमकाने की ज़रूरत क्या।
अनुभव का अमृत मिल जाए चेतन गहरे सागर में,
लफ़्ज़ों के वन बोकर अर्थ उगाने की ज़रूरत क्या।
साँसों में जब बस जाए स्वर उस एक अटल सच्चाई का,
माला लेकर सबके आगे गीत सुनाने की ज़रूरत क्या।
अहंकार का पर्दा गिर जाएगा निर्मल अंतर आँगन में,
माया के रंग फिर जीवन में सजाने की ज़रूरत क्या।
मौन बने जब पथ सच्चाई का, मन पाए उजली दृष्टि,
“प्रसंग” फिर लोगों को बातें दोहराने की ज़रूरत क्या।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर