ऋगुवेद सूक्ति--(३१) की व्याख्या
ऋगुवेद -(मण्डल 10, सूक्त 26, मन्त्र 9)
इमं नः श्रुणवद्धवम्।
पद–पद अर्थ
इमम् — इस (प्रार्थना को)
नः — हमारी
श्रुणवद् — सुने / श्रवण करे
हवम् — आह्वान, प्रार्थना, पुकार
भावार्थ--
हे परमेश्वर! हमारी इस प्रार्थना और पुकार को सुनिए।
व्याख्या--
इस मन्त्र में ऋषि परमेश्वर से विनम्र प्रार्थना करते हैं कि वह भक्तों की पुकार को सुनें। वैदिक परम्परा में “हव” शब्द का अर्थ केवल यज्ञ में की जाने वाली आहुति ही नहीं, बल्कि हृदय से की गई सच्ची प्रार्थना और आह्वान भी है।
अर्थ यह है कि जब मनुष्य श्रद्धा, सत्य और पवित्र भावना से ईश्वर को पुकारता है, तब परमेश्वर उसकी प्रार्थना को अवश्य सुनते हैं और उसे मार्गदर्शन, शक्ति और संरक्षण प्रदान करते हैं।
यह मन्त्र मनुष्य को यह शिक्षा देता है कि—
ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वश्रुता है।
सच्चे मन से की गई प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती।
मनुष्य को संकट या आवश्यकता के समय ईश्वर का स्मरण करना चाहिए।
वेदों में प्रमाण--
1. ऋग्वेद-- 1.89.1
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भावार्थ :
हे देवो! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें।
अर्थ :
मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसकी प्रार्थना को सुने और उसे कल्याणकारी मार्ग प्रदान करे।
2. ऋगुवेद--7.32.26
श्रुधि हवम्।
भावार्थ :
हे प्रभु! हमारी प्रार्थना (हव) को सुनिए।
अर्थ :
यहाँ ऋषि स्पष्ट रूप से ईश्वर से कहते हैं कि वह भक्त की पुकार को सुनें।
3. ऋग्वेद-- 1.25.19
श्रुधि हवम् अद्य च मृळय त्वम्।
भावार्थ :
हे प्रभु! आज हमारी प्रार्थना सुनिए और हम पर कृपा कीजिए।
4. यजुर्वेद-- 36.18
मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
भावार्थ :
हम सब प्राणी एक-दूसरे को मित्रभाव से देखें।
अर्थ :
यह प्रार्थना है कि ईश्वर मानव के भीतर सद्भावना उत्पन्न करें।
5. अथर्ववेद-- 19.9.10
श्रुण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः।
भावार्थ :
हे अमृत के पुत्रों! सब सुनो।
अर्थ :
यहाँ भी प्रार्थना और आह्वान की भावना प्रकट होती है कि दिव्य सत्ता मनुष्य की वाणी और प्रार्थना को ग्रहण करे।
उपनिषदों में प्रमाण--
१--श्वेताश्वतर उपनिषद् --6.23
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥
भावार्थ :
जिस मनुष्य की परमेश्वर में और गुरु में गहरी भक्ति होती है, उसके लिए उपनिषदों के सत्य अपने आप प्रकट हो जाते हैं।
अर्थ :
यह बताता है कि परमात्मा भक्त की भावना को स्वीकार करते हैं और उसे ज्ञान प्रदान करते हैं।
२- कंठ उपनिषद् --1.2.23
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥
भावार्थ :
यह आत्मा केवल वाणी, बुद्धि या अधिक शास्त्र सुनने से नहीं मिलता; जिसे परमात्मा स्वीकार करते हैं, उसी पर वह स्वयं प्रकट होते हैं।
सच्चे भाव से किया गया आह्वान ही ईश्वर की कृपा का कारण बनता है।
३-मुण्डकोपनिषद --3.2.3
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः।
भावार्थ :
आत्मा केवल उपदेश या बुद्धि से नहीं मिलता; जिस साधक को परमात्मा स्वीकार करते हैं, वही उसे प्राप्त करता है।
भक्ति और प्रार्थना से ही ईश्वर की कृपा मिलती है।
४-तैत्तिरीय उपनिषद् --3.1.1
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते।
येन जातानि जीवन्ति।
यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
भावार्थ :
जिससे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिससे जीवित रहते हैं और जिसमें अन्त में प्रवेश करते हैं वही ब्रह्म है।
वही सर्वज्ञ ब्रह्म सभी प्राणियों की प्रार्थना और भावनाओं को जानता है।
५-ईश उपनिषद्- 15
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥
भावार्थ :
हे परम प्रकाशस्वरूप प्रभु! सत्य के मुख को ढकने वाले आवरण को हटाइए ताकि सत्य का दर्शन हो सके।
यह परमात्मा से की गई प्रार्थना है कि वे साधक की विनती को सुनकर उसे सत्य का ज्ञान दें।
६.बृहदारण्यक उपनिषद् --1.3.28
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥
भावार्थ :
हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिए।
यह स्पष्ट प्रार्थना है कि परमात्मा मनुष्य की पुकार सुनकर उसे सही मार्ग पर ले जाएँ।
७-प्रश्न उपनिषद् --6.3
स प्राणमसृजत।
भावार्थ :
परमात्मा ने ही प्राण की रचना की।
जो परमात्मा सब प्राणियों का कर्ता और ज्ञाता है, वही उनके मन और प्रार्थना को भी जानता है।
८-मैत्री उपनिषद् --6.17
(भावार्थ) :
जो मनुष्य श्रद्धा और ध्यान से ब्रह्म का स्मरण करता है, वह उसी ब्रह्म को प्राप्त होता है।
यह बताता है कि ईश्वर भक्त की साधना और प्रार्थना को स्वीकार करते हैं।
निष्कर्ष--
वेद और उपनिषद दोनों का सिद्धान्त है कि—
परमात्मा सर्वज्ञ है।
वह भक्त की प्रार्थना और आह्वान को सुनता है।
सच्ची श्रद्धा से किया गया आह्वान मनुष्य को ज्ञान और मुक्ति की ओर ले जाता है।
पुराणों में प्रमाण --
1. विष्णु पुराण _
स्मृतो हि भगवान् विष्णुः संकटनाशनः।
भावार्थ :
भगवान विष्णु का स्मरण करने से संकट दूर हो जाते हैं।
जो भक्त श्रद्धा से भगवान को पुकारता है, उसकी प्रार्थना भगवान सुनते हैं और उसकी रक्षा करते हैं।
2. भागवत पुराण --10.14.8
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
भावार्थ :
जो मनुष्य भगवान की कृपा को समझते हुए उन्हें स्मरण करता है, वह अंततः भगवान की कृपा प्राप्त करता है।
भक्ति और प्रार्थना से भगवान की अनुकम्पा प्राप्त होती है।
3. पद्म पुराण --
नामस्मरणमात्रेण नरो याति परां गतिम्।
भावार्थ :
केवल भगवान के नाम का स्मरण करने से ही मनुष्य उच्च अवस्था को प्राप्त करता है।
यह दर्शाता है कि भगवान भक्त की पुकार और स्मरण को स्वीकार करते हैं।
4.शिव पुराण--
भक्तानां आर्तिनाशाय शिवो नित्यं प्रसीदति।
भावार्थ :
भगवान शिव अपने भक्तों के दुःखों को दूर करने के लिए सदैव प्रसन्न रहते हैं।
भक्त की प्रार्थना भगवान तक पहुँचती है और वे उसकी सहायता करते हैं।
पुराणों में बार-बार यह सिद्धान्त मिलता है कि—
परमात्मा भक्त की प्रार्थना सुनते हैं।
स्मरण, जप और भक्ति से भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
संकट के समय भगवान भक्त की रक्षा करते हैं।
५--स्कंद पुराण --
भक्तवत्सल भगवान् भक्तानां दुःखनाशनः।
भावार्थ :
भगवान भक्तों से प्रेम करने वाले और उनके दुःखों को दूर करने वाले हैं।
जब भक्त भगवान को पुकारता है, तो वे उसकी प्रार्थना सुनकर उसकी सहायता करते हैं।
६. गरुड़ पुराण --
हरिस्मरणमात्रेण सर्वदुःखक्षयो भवेत्।
भावार्थ :
भगवान हरि का स्मरण मात्र करने से ही मनुष्य के दुःख नष्ट हो जाते हैं।
यह दर्शाता है कि भगवान भक्त की पुकार और स्मरण को स्वीकार करते हैं।
७.ब्रह्म पुराण --
नमस्कारप्रियो विष्णुः भक्तानुग्रहकारकः।
भावार्थ :
भगवान विष्णु नमस्कार और भक्ति से प्रसन्न होकर भक्तों पर कृपा करते हैं।
भक्त की प्रार्थना भगवान को प्रसन्न करती है और वे उसे आशीर्वाद देते हैं।
८. अग्नि पुराण --
स्मृतो हरति पापानि विष्णुः सर्वदुःखनाशनः।
भावार्थ :
भगवान विष्णु का स्मरण करने से पाप और दुःख दूर हो जाते हैं।
अर्थ :
यह बताता है कि भगवान भक्त के स्मरण और प्रार्थना को सुनते हैं।
निष्कर्ष
पुराणों का भी यही सिद्धान्त है—
भगवान भक्तवत्सल हैं।
वे भक्त की प्रार्थना और स्मरण को स्वीकार करते हैं।
श्रद्धा से किया गया आह्वान भगवान की कृपा प्राप्त कराता है।
1. भगवत् गीता --9.22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
भावार्थ :
जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिन्तन और भक्ति करते हैं, उनके योग और क्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
भगवान भक्त की प्रार्थना और भक्ति को स्वीकार करके उसकी रक्षा और पालन करते हैं।
2. भगवत् गीता --4.11
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
भावार्थ :
जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उन्हें उसी प्रकार फल देता हूँ।
ईश्वर भक्त की भावना और प्रार्थना का प्रत्युत्तर देते हैं।
3. भगवत् गीता --7.21
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥
भावार्थ :
जो भक्त जिस देवता की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, मैं उसी में उसकी श्रद्धा को स्थिर कर देता हूँ।
परमात्मा भक्त की भावना और प्रार्थना को जानते हैं।
4. भगवत् गीता --10.10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥
भावार्थ :
जो भक्त प्रेमपूर्वक मेरी भक्ति करते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त कर सकें।
ईश्वर भक्त की पुकार सुनकर उसे ज्ञान और मार्गदर्शन देते हैं।
निष्कर्ष--
गीता का सिद्धान्त है—
भगवान भक्त की भक्ति और प्रार्थना को सुनते हैं।
वे भक्त की रक्षा, पालन और मार्गदर्शन करते हैं।
सच्ची श्रद्धा से की गई प्रार्थना का फल अवश्य मिलता है।
१-महाभारत --(वनपर्व)
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।
भावार्थ :
हे प्रिय! जो मनुष्य शुभ कर्म करता है और ईश्वर का स्मरण करता है, वह कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
ईश्वर भक्त के सत्कर्म और प्रार्थना को स्वीकार करके उसकी रक्षा करते हैं।
२--महाभारत--(शान्तिपर्व)
भक्तानां प्रार्थनां देवः शृणोति करुणानिधिः।
भावार्थ :
करुणा के सागर भगवान भक्तों की प्रार्थना सुनते हैं।
परमात्मा भक्त की पुकार को सुनकर उस पर कृपा करते हैं ।३--महाभारत--(अनुशासनपर्व)
स्मृतो हि भगवान् विष्णुः सर्वदुःखप्रणाशनः।
भावार्थ :
भगवान विष्णु का स्मरण करने से सभी दुःख नष्ट हो जाते हैं।
भक्ति और प्रार्थना भगवान की कृपा प्राप्त करने का साधन है।
4. महाभारत -(भीष्मपर्व)
प्रार्थनाभिर्हि देवेशः प्रसन्नो भवति प्रभु:।
भावार्थ --भगवान प्रार्थनाओं से प्रसन्न होते हैं।
सच्चे मन से की गयी प्रार्थना ईश्वर तक पहुँचती है और “ईश्वर भक्त की प्रार्थना सुनते हैं तथा उसकी पुकार का उत्तर देते हैं”—
स्मृति ग्रन्थों मे प्रमाण --
१- मनु स्मृति --2.87
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥
भावार्थ :
वेद, स्मृति, सदाचार और आत्मा को प्रिय आचरण— ये धर्म के चार लक्षण बताए गए हैं।
धर्म के अनुसार जीवन और ईश्वर की उपासना मनुष्य को ईश्वर की कृपा का पात्र बनाती है।
२-यागवल्क्य स्मृति --
श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते।
तत्र श्रुतिः प्रमाणं स्यात्।
भावार्थ :
जहाँ श्रुति, स्मृति और पुराणों में मतभेद दिखाई दे, वहाँ श्रुति (वेद) को प्रमाण माना जाता है।
स्मृतियाँ भी वेदों के सिद्धान्त का अनुसरण करती हैं, जिनमें प्रार्थना और ईश्वर की उपासना का महत्व बताया गया है।
३-पराशर स्मृति --
स्मरणाद् देवदेवस्य विष्णोः पापं प्रणश्यति।
भावार्थ :
देवों के देव भगवान विष्णु का स्मरण करने से पाप नष्ट हो जाते हैं।
भक्ति और स्मरण से भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
“ईश्वर भक्त की प्रार्थना सुनते हैं और उसकी पुकार स्वीकार भी करते हैं।
१-चाणक्य नीति --
नित्यं स्मरेद् हरिं भक्त्या नित्यं धर्मं समाचरेत्।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥
भावार्थ :
मनुष्य को नित्य भक्ति से भगवान का स्मरण करना चाहिए और धर्म का आचरण करना चाहिए; धर्म से ही सब कुछ प्राप्त होता है।
ईश्वर का स्मरण और प्रार्थना मनुष्य को भगवान की कृपा दिलाते हैं।
२- हितोपदेश--
यस्य स्मरणमात्रेण दुःखं नश्यति तत्क्षणात्।
भावार्थ :
जिस परमात्मा के स्मरण मात्र से दुःख तुरंत नष्ट हो जाते हैं।
यह दर्शाता है कि ईश्वर भक्त के स्मरण और प्रार्थना को स्वीकार करते हैं।
३--. सुभाषित --
(नीति-साहित्य)
स्मृतो हि भगवान् विष्णुः सर्वदुःखप्रणाशनः।
भावार्थ :
भगवान विष्णु का स्मरण करने से सभी दुःख दूर हो जाते हैं।
ईश्वर का स्मरण और प्रार्थना मनुष्य के दुःखों को दूर करने का साधन बताया गया है।
निष्कर्ष--
नीति-ग्रन्थों का भी यही सिद्धान्त है—
मनुष्य को संकट और सुख दोनों में ईश्वर का स्मरण करना चाहिए।
भक्ति और प्रार्थना से ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।
परमात्मा ही मनुष्य का सच्चा सहायक और रक्षक है।
“ईश्वर भक्त की प्रार्थना सुनते हैं और उसकी पुकार स्वीकार करते हैं”।
१. गर्ग संहिता में प्रमाण--
स्मरणादेव कृष्णस्य नश्यन्ति विघ्नसङ्कटाः।
भक्तानां करुणासिन्धुः सदा तेषां हिते रतः॥
भावार्थ :
भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करने मात्र से विघ्न और संकट नष्ट हो जाते हैं। वे भक्तों पर करुणा करने वाले हैं और सदैव उनके हित में लगे रहते हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि भगवान भक्त की प्रार्थना और स्मरण को स्वीकार करते हैं और उसकी सहायता करते हैं।
२-- योग वशिष्ठ में प्रमाण--
यथा भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।
भावार्थ :
मनुष्य की जैसी भावना होती है, उसे उसी प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती है।
यदि मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से परमात्मा का स्मरण करता है, तो उसकी प्रार्थना फल देती है और उसे आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
निष्कर्ष--
इन ग्रन्थों का भी यही सिद्धान्त है
ईश्वर भक्तवत्सल हैं।
वे भक्त की प्रार्थना और स्मरण को सुनते हैं।
“ईश्वर भक्त की प्रार्थना सुनते हैं और उसकी पुकार स्वीकार करते हैं।
१-वाल्मीकि रामायण-- (युद्धकाण्ड)
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
भावार्थ :
जो मनुष्य एक बार भी मेरी शरण में आकर कहता है कि “मैं आपका हूँ”, उसे मैं सभी प्राणियों से अभय देता हूँ — यह मेरा व्रत है।
भगवान श्रीराम भक्त की शरणागति और प्रार्थना को स्वीकार करते हैं और उसकी रक्षा करते हैं।
२-वाल्मीकि रामायण (अरण्यकाण्ड)
श्लोक :
धर्मात्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यदि।
भावार्थ :
यदि दशरथ पुत्र राम धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं, तो वे भक्तों की रक्षा अवश्य करेंगे।
यहाँ भी विश्वास प्रकट किया गया है कि भगवान अपने भक्तों की पुकार को सुनते हैं।
श्रीराम का स्मरण और प्रार्थना संकट से रक्षा का साधन बताया गया है।
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