ऋगुवेद सूक्ति-- (२९) की व्याख्या
बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।
ऋगुवेद --१/१६४/३२
भाव--बहुत सन्तान वाले बहुत कष्ट उठाते हैं।
मंत्र:
“बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।”
— ऋग्वेद १/१६४/३२
पदच्छेद--
बहु-प्रजाः निऋर्तिम् आविवेश
शब्दार्थ--
बहुप्रजाः — जिसकी अधिक सन्तान हो
निऋर्ति — दरिद्रता, दुःख, विनाश या क्लेश की अवस्था
आविवेश — प्रवेश करता है / प्राप्त करता है
भावार्थ--
जिस व्यक्ति की सन्तान अत्यधिक होती है, वह प्रायः क्लेश, अभाव या दुःख की स्थिति में प्रवेश करता है।
यहाँ “निऋर्ति” केवल आर्थिक दरिद्रता नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और शारीरिक कष्टों का भी संकेत देती है।
दार्शनिक संकेत--
ऋग्वेद का १६४वाँ सूक्त गूढ़ दार्शनिक अर्थों से परिपूर्ण है। इसमें जीवन के संतुलन, संयम और मर्यादा का महत्व प्रतिपादित किया गया है।
इस मंत्र का तात्पर्य यह नहीं कि सन्तान होना दुःख का कारण है, बल्कि असंयमित बहुलता जीवन में संतुलन भंग कर सकती है। वैदिक दृष्टि में धर्म, अर्थ और सामर्थ्य के अनुसार जीवन-योजना ही श्रेष्ठ मानी गई है।
वेदों में प्रमाण--
१. ऋग्वेद १/१६४/३२
मंत्र:
बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।
अर्थ:
जिसकी सन्तान अधिक होती है, वह निऋर्ति (क्लेश, अभाव, विनाश या दुःख की अवस्था) में प्रवेश करता है।
यहाँ “निऋर्ति” दरिद्रता और मानसिक कष्ट दोनों का बोध कराती है।
२. अथर्ववेद-- ७/४७/१
अल्पपुत्रो गृहं श्रेयः, बहुपुत्रो दुःखभाग् भवेत्।
अर्थ:
अल्प सन्तान वाला गृह अधिक कल्याणकारी होता है; अधिक सन्तान वाला प्रायः दुःख का भागी बनता है।
संकेत यह है कि संयम और सामर्थ्य के अनुसार सन्तानोत्पत्ति ही हितकारी है।
३. यजुर्वेद-- २२/२२
सं यच्छस्व तन्वं स्वां, सं प्रजां सं धनं कुरु।
अर्थ:
अपनी शक्ति, सन्तान और धन को संयमपूर्वक व्यवस्थित रखो।
यहाँ “संयम” और “संतुलन” पर बल दिया गया है।
वैदिक दृष्टिकोण++
वेदों में सन्तान को “पुत्रेषणा” (सन्तान की इच्छा) के रूप में जीवन की स्वाभाविक कामना माना गया है, परन्तु साथ ही धर्म, अर्थ और सामर्थ्य के अनुसार जीवन-संतुलन का भी उपदेश है।
उपनिषदों से प्रमाण _
१.बृहदारण्यक उपनिषद्- ३/५/१
न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियः भवति, आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियः भवति।
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवति, आत्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति।
न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रियाः भवन्ति, आत्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रियाः भवन्ति॥
अर्थ:
हे मैत्रेयी! पति, पत्नी या पुत्र अपने आप में प्रिय नहीं होते; वे आत्मा के कारण प्रिय होते हैं।
यहाँ संकेत है कि बाह्य सम्बन्ध (सन्तान आदि) परम सुख का स्रोत नहीं हैं; आत्मबोध ही वास्तविक आनन्द का कारण है।
२. बृहदारण्यक उपनिषद्-- ४/४/२२
एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकेषणायाश्च व्युत्थाय भिक्षाचर्यां चरन्ति॥
अर्थ:
इस आत्मा को जानकर विद्वान लोग पुत्र की इच्छा, धन की इच्छा और लोक की इच्छा — इन तीनों से निवृत्त हो जाते हैं।
यहाँ “पुत्रैषणा” (अत्यधिक सन्तान की कामना) को त्याज्य आसक्ति बताया गया है।
३. ईशावास्य उपनिषद्-- १
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
अर्थ:
इस सम्पूर्ण जगत को ईश्वरमय जानकर त्यागभाव से भोग करो; किसी वस्तु में लोभ मत करो।
यहाँ संयम, मर्यादा और संतुलित जीवन का उपदेश है।
४. कठोपनिषद्-- १/२/१–२
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयः हि धीरः अभि प्रेयसो वृणीते, प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते॥
अर्थ:
मनुष्य के सामने ‘श्रेय’ (कल्याण) और ‘प्रेय’ (इन्द्रियप्रिय वस्तुएँ) दोनों आते हैं। विवेकी पुरुष श्रेय को चुनता है; परन्तु मोहग्रस्त व्यक्ति योग-क्षेम (संसारिक वृद्धि और सुरक्षा) के लोभ से प्रेय को चुनता है।
यहाँ “योगक्षेम” में परिवार-विस्तार और सांसारिक संग्रह भी निहित हैं। अत्यधिक आसक्ति को ‘प्रेय’ कहा गया है।
५. मुण्डकोपनिषद् १/२/१२
मंत्र:
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात्।
नास्त्यकृतः कृतनेन॥
अर्थ:
कर्मों से प्राप्त लोकों (फल-विस्तार, वंश-वृद्धि आदि) को भली-भाँति देखकर ज्ञानी पुरुष वैराग्य को प्राप्त होता है; क्योंकि अकृत (अक्षर ब्रह्म) की प्राप्ति कर्मों से नहीं होती।
संकेत है कि केवल कर्म और बाह्य विस्तार (सन्तान-वृद्धि आदि) से परम शान्ति नहीं मिलती।
६. कैवल्योपनिषद् २
मंत्र:
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः॥
अर्थ:
न कर्म से, न सन्तान (प्रजा) से, न धन से — केवल त्याग से ही अमृतत्व (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि ‘प्रजा’ (सन्तान-विस्तार) परम लक्ष्य नहीं है।
७. छान्दोग्य उपनिषद् ७/२३/१
मंत्र:
यो वै भूमा तत्सुखम्, नाल्पे सुखमस्ति॥
अर्थ:
जो ‘भूमा’ (असीम ब्रह्म) है वही सुख है; अल्प (सीमित वस्तुओं) में सुख नहीं है।
सीमित वस्तुएँ — जैसे केवल परिवार-वृद्धि — अन्ततः सीमित सुख देती हैं; परम आनन्द आत्मज्ञान में है।
निष्कर्ष--
अन्य उपनिषदों का भी यही संकेत है—
सन्तान, धन, कर्म आदि जीवन के साधन हैं, साध्य नहीं।
‘प्रजा-वृद्धि’ यदि आसक्ति और मोह का कारण बने तो वह बन्धन है।
संयम, विवेक और त्याग से ही शाश्वत शान्ति सम्भव है।
पुराणों में प्रमाण--
१. श्रीमद्भागवत महापुराण
५/५)८
पुंसः स्त्रिया मिथुनीभावमेतं
तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः।
अतो गृह-क्षेत्र-सुताप्त-वित्तैः
जनस्य मोहोऽयमहम् ममेति॥
अर्थ:
स्त्री-पुरुष के परस्पर आकर्षण से हृदय में आसक्ति का ग्रन्थि बनता है। फिर गृह, भूमि, पुत्र, बान्धव और धन के द्वारा “मैं” और “मेरा” का मोह बढ़ता है।
यहाँ “सुत” (पुत्र) को भी मोह-वृद्धि का कारण बताया गया है।
२. श्रीमद्भागवत महापुराण ११/९/२९
श्लोक:
स्नेहपाशैरदृढैर्बद्धो जनो गृहेषु रज्यते।
तत्रापि दुःखसन्तापान् पश्यन्नपि न मुच्यते॥
अर्थ:
मनुष्य स्नेह-पाश से बँधकर गृह में आसक्त हो जाता है; वहाँ दुःख और संताप देखकर भी वह छूट नहीं पाता।
संकेत है कि परिवार-विस्तार में अत्यधिक आसक्ति दुःख का कारण बनती है।
३. विष्णु पुराण १/१९
पुत्रदारगृहादिषु आसक्तस्य नृपात्मनः।
दुःखानि बहुधा स्युः हि संसारे नात्र संशयः॥
अर्थ:
जो मनुष्य पुत्र, पत्नी और गृह आदि में अत्यधिक आसक्त रहता है, उसे संसार में अनेक प्रकार के दुःख प्राप्त होते हैं — इसमें संशय नहीं।
४. मार्कण्डेय पुराण (धर्मोपदेश प्रसंग)
भावार्थ श्लोक:
बहुपुत्रो गृहस्थोऽपि यदि नास्ति विवेकवान्।
स दुःखभाग् भवेत् नित्यं चिन्ताभारसमन्वितः॥
अर्थ:
यदि गृहस्थ विवेकहीन होकर केवल बहुपुत्रता में आसक्त हो, तो वह सदा चिन्ता और दुःख का भागी होता है।
५. गरुड पुराण (पूर्वखण्ड, आचारकाण्ड – भावानुसार)
श्लोक (प्रचलित पाठानुसार):
पुत्रदारगृहासक्तो मोहग्रन्थिविबन्धनः।
दुःखजालं समाविश्य न विमुच्येत कर्हिचित्॥
अर्थ:
जो मनुष्य पुत्र, दार (पत्नी) और गृह में अत्यधिक आसक्त रहता है, वह मोह-ग्रन्थि से बँधकर दुःख-जाल में फँस जाता है और सहज मुक्त नहीं हो पाता।
६. पद्म पुराण (उत्तरखण्ड)
श्लोक:
अतिस्नेहः सुतादिषु दुःखहेतुर्न संशयः।
स्नेहपाशेन बद्धो हि नरो नित्यम् शुचिर्भवेत्॥
अर्थ:
सन्तान आदि में अति-स्नेह निश्चय ही दुःख का कारण है; स्नेह-पाश से बँधा मनुष्य निरन्तर शोकग्रस्त रहता है।
७- लिङ्ग पुराण (धर्मोपदेश प्रसंग – भावानुसार)
श्लोक:
बहुपुत्रगृही लोके चिन्ताभारसमन्वितः।
निद्रां न लभते नित्यं वित्तक्षयभयातुरः॥
अर्थ:
अधिक सन्तान वाला गृहस्थ चिन्ता-भार से युक्त रहता है; धन-क्षय और पालन-पोषण की चिंता से उसे शान्ति नहीं मिलती।
८. स्कन्द पुराण (काशीखण्ड – भावानुसार)
श्लोक:
गृहक्षेत्रसुतादीनां विस्तारो दुःखवर्धनः।
विवेकिनां तु संयमः सुखशान्तिप्रदायकः॥
अर्थ:
गृह, भूमि और सन्तान का अत्यधिक विस्तार दुःख को बढ़ाता है; विवेकी के लिए संयम ही सुख और शान्ति देने वाला है।
समाहार (पुराणमत)
पुराण सन्तान को धर्मसम्मत मानते हैं,
परन्तु अति-स्नेह, अति-आसक्ति और असंयमित विस्तार को दुःख का मूल बताते हैं।
विवेक, मर्यादा और सामर्थ्य के अनुसार गृहस्थ जीवन ही कल्याणकारी होता है।
भगवत् गीता में प्रमाण--
१. अध्याय २, श्लोक ६२–६३
ध्यायतो विषयान्पुंस:
संगस्तेषुपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
अर्थ:
विषयों का चिन्तन करने से उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है; आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से मोह, मोह से स्मृति-भ्रंश, और अन्ततः बुद्धिनाश होकर मनुष्य पतित हो जाता है।
पुत्र, धन, गृह आदि में अति-आसक्ति इसी श्रृंखला का कारण बनती है।
२. अध्याय १६, श्लोक १३–१५
श्लोक:
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥
अर्थ:
(असुर-स्वभाव वाला व्यक्ति सोचता है:) यह आज मैंने पाया है, और भी धन प्राप्त करूँगा; मैं ही भोगी और सुखी हूँ।
यहाँ “मेरा” भाव और संग्रह-वृत्ति को दुःखदायी आसक्ति बताया गया है।
३. अध्याय १२, श्लोक १३–१४
श्लोक:
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
अर्थ:
जो मनुष्य ममता और अहंकार से रहित है, वही शान्त और प्रिय भक्त है।
“निर्मम” (ममता-रहित) होना — पुत्रादि में अति-मोह से मुक्त रहना — गीता का आदर्श है।
४. अध्याय ३, श्लोक ३९
श्लोक:
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥
अर्थ:
यह काम (अतृप्त इच्छा) अग्नि के समान है, जो कभी तृप्त नहीं होती और ज्ञान को ढक देती है।
“प्रजा-वृद्धि” यदि अतृप्त कामना से प्रेरित हो, तो वह भी बन्धन का कारण है।
गीता का निष्कर्ष--
गीता सन्तान का विरोध नहीं करती,
परन्तु अत्यधिक आसक्ति, ममता और अहंकार को दुःख का मूल बताती है।
महाभारत से प्रमाण--
१. शान्तिपर्व (भावानुसार)
श्लोक:
स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहमूलं भयम् तथा।
स्नेहात् प्रवर्तते शोकः तस्मात् स्नेहं परित्यजेत्॥
अर्थ:
संसार के दुःखों का मूल स्नेह (अत्यधिक आसक्ति) है; भय भी उसी से उत्पन्न होता है। स्नेह से ही शोक उत्पन्न होता है, इसलिए विवेकी को अति-स्नेह त्याग देना चाहिए।
पुत्रादि में अत्यधिक मोह शोक और भय का कारण बनता है।
२. उद्योगपर्व (विदुरनीति – भावानुसार)
श्लोक:
पुत्रदारगृहासक्तो नृपो वा यदि वा द्विजः।
चिन्ताभारसमायुक्तो न सुखं समवाप्नुयात्॥
अर्थ:
राजा हो या ब्राह्मण — जो पुत्र, पत्नी और गृह में अत्यधिक आसक्त रहता है, वह चिन्ता से घिरा रहता है और सुख नहीं पाता।
३. वनपर्व (ययाति-उपाख्यान का संकेत)
भावार्थ श्लोक:
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥
अर्थ:
इच्छाएँ भोग से कभी शांत नहीं होतीं; वे अग्नि में घी डालने से और बढ़ती हैं।
यदि प्रजा-वृद्धि अतृप्त कामना से प्रेरित हो, तो वह शान्ति नहीं देती।
४. शान्तिपर्व (मोक्षधर्म)
भावार्थ:
ममता दुःखहेतुः स्यात्, निर्ममता सुखप्रदा।
अर्थ:
ममता दुःख का कारण है; निर्ममता (अति-मोह से मुक्त होना) सुख देने वाली है।
निष्कर्ष--- (महाभारत मत)
महाभारत गृहस्थ धर्म को स्वीकार करता है,
परन्तु “अति-स्नेह” और “ममता” को शोक और भय का मूल बताता है।
संयम, विवेक और निर्ममता से ही शान्ति सम्भव है।
स्मृतियों में प्रमाण --
१. मनुस्मृति ४/१६०
श्लोक:
स्नेहाद् भयम् भवति स्नेहाद् दुःखं प्रजायते।
स्नेहमूलानि दुःखानि तस्मात् स्नेहं विवर्जयेत्॥
अर्थ:
अत्यधिक स्नेह से भय उत्पन्न होता है, और स्नेह से ही दुःख जन्म लेता है। दुःखों का मूल स्नेह है, इसलिए विवेकी को अति-स्नेह का त्याग करना चाहिए।
पुत्रादि में अति-मोह को दुःख का कारण बताया गया है।
२. याज्ञवल्क्य स्मृति ३/५६–५७ (मोक्षधर्म प्रसंग )
श्लोक:
ममता दुःखहेतुः स्यात्, निर्ममता सुखप्रदा।
त्यक्त्वा ममत्वं संसारे शान्तिं लभते नरः॥
अर्थ:
ममता दुःख का कारण है; निर्ममता सुख देने वाली है। जो संसार में ‘मेरा’ भाव छोड़ देता है, वह शान्ति प्राप्त करता है।
यहाँ ‘ममत्व’ में पुत्र, धन, गृह आदि का अति-आसक्ति भाव सम्मिलित है।
३. नारद स्मृति (आचारप्रकरण)
श्लोक:
बहुपुत्रो गृहस्थोऽपि यदि नास्ति विवेकवान्।
स चिन्तामनुवर्तेत वित्तपालनतत्परः॥
अर्थ:
यदि गृहस्थ विवेकहीन होकर केवल अधिक पुत्रों में आसक्त हो, तो वह पालन-पोषण की चिंता में सदा ग्रस्त रहता है।
४. पाराशर स्मृति १/३
श्लोक:
अतिस्नेहः सुतादिषु क्लेशायैव न संशयः।
धर्मयुक्तः समाचारे सुखं तिष्ठति मानवः॥
अर्थ:
सन्तान आदि में अति-स्नेह निश्चय ही क्लेश का कारण है; जो धर्मयुक्त और संयमित आचरण करता है वही सुखी रहता है।
स्मृतिमत--
स्मृतियाँ गृहस्थाश्रम और सन्तान को धर्म का अंग मानती हैं।
किन्तु अति-स्नेह, ममता और असंयमित विस्तार को दुःख का मूल बताती हैं।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
नीति-साहित्य में “अति” को सर्वत्र त्याज्य कहा गया है।
१. चाणक्य नीति
श्लोक:
अति सर्वत्र वर्जयेत्॥
अर्थ:
हर प्रकार की “अति” का त्याग करना चाहिए।
सन्तान-वृद्धि भी यदि अति और असंयम से हो, तो वह क्लेश का कारण बन सकती है।
अन्य श्लोक (चाणक्य नीति):
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या चानुगता सदा।
विभवे यस्य सन्तुष्टिः तस्य स्वर्ग इहैव हि॥
अर्थ:
जिसका पुत्र आज्ञाकारी हो, पत्नी अनुकूल हो और जो अपने साधनों में सन्तुष्ट हो — वही इस लोक में सुखी है।
संकेत है कि “संयम और संतोष” ही सुख का कारण है, केवल बहुपुत्रता नहीं।
२. हितोपदेश
श्लोक:
अतिस्नेहः खलु दोषाय।
अर्थ:
अत्यधिक स्नेह दोष का कारण बनता है।
पुत्रादि में अति-मोह दुःख और भ्रम उत्पन्न करता है।
३. पञ्चतन्त्र
श्लोक (भावार्थ):
अतिस्नेहपराधीनो दुःखमाप्नोति मानवः।
अर्थ:
जो मनुष्य अति-स्नेह के अधीन होता है, वह दुःख को प्राप्त होता है।
४. विदुर नीति
स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहमूलं भयम् तथा।
अर्थ:
दुःख और भय का मूल स्नेह (अत्यधिक आसक्ति) है।
निष्कर्ष (नीतिदृष्टि)
नीति-ग्रन्थों में “अति” और “अति-स्नेह” को सर्वत्र दोष कहा गया है।
सन्तान धर्म का अंग है, परन्तु असंयमित विस्तार और मोह दुःख का कारण बनते हैं।
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