Hindi Quote in Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

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ऋगुवेद सूक्ति-- (२७) की व्याख्या
मन्त्र —
“मा प्रगाम पथोवयम्”
ऋग्वेद_ १०.५७.१
भावार्थ --
हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों।
पदच्छेद
मा — नहीं
प्रगाम — आगे बढ़ें / जाएँ
पथः — मार्ग से
वयम् — हम
भावार्थ--
“हम (सत्य) मार्ग से विचलित न हों।”
यहाँ “पथः” का अर्थ सामान्य मार्ग नहीं, बल्कि ऋत, धर्म और सत्य का मार्ग है — वही जिसे वैदिक परम्परा में वेदमार्ग कहा गया है।
दार्शनिक अर्थ--
यह मन्त्र एक प्रार्थना है —
हम अधर्म, अज्ञान या विपरीत आचरण की ओर न जाएँ।
हम सत्य, ऋत और देवमार्ग पर स्थिर रहें।
हमारा जीवन वेद-विहित मर्यादा से पृथक न हो।
वेदों में प्रमाण--
१. ऋग्वेद १.१८९.१
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणम् एनः
भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विदेम ॥
भावार्थ —
हे अग्ने! आप हमें शुभ (सत्य) मार्ग से ले चलें। हमारे पापों को दूर करें और हमें धर्ममार्ग पर स्थापित करें।
यहाँ “सुपथा” (श्रेष्ठ मार्ग) से चलाने की प्रार्थना है।
२. यजुर्वेद ४०.८ (ईशावास्योपनिषद् मन्त्र ८)
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्...
(अर्थ-संदर्भ में)
भावार्थ — परमात्मा शुद्ध, निष्पाप और सर्वव्यापक है; उसका मार्ग भी शुद्ध है। मनुष्य को उसी शुद्ध मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
३. अथर्ववेद १२.१.१
सत्यं बृहद् ऋतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति ।
भावार्थ —
सत्य, ऋत (धर्म), तप और यज्ञ — ये ही पृथ्वी को धारण करते हैं।
अर्थात् संसार की स्थिरता धर्ममार्ग पर निर्भर है।
४. सामवेद (ऋग्वैदिक मन्त्र १.१८९.१ का सामरूप)
सामवेद में भी वही प्रार्थना दोहराई गई है —
“अग्ने नय सुपथा...”
यह दर्शाता है कि वेदमार्ग पर स्थिर रहने की भावना समस्त वेदों में समान है।
५. ऋग्वेद ५.५१.१५
ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः।
भावार्थ —
दुष्कर्मी लोग ऋत (सत्य) के मार्ग को पार नहीं कर सकते।
उपनिषदों में प्रमाण --
१. कठोपनिषद् १.२.२
ऋषि प्रेयश्च मनुष्यमेतः इक,
तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरः अभि प्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते॥
भावार्थ —
मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याण का मार्ग) और प्रेय (इन्द्रिय-सुख का मार्ग) दोनों आते हैं। विवेकी पुरुष श्रेय मार्ग को चुनता है, जबकि मूर्ख प्रेय को अपनाता है।
यहाँ स्पष्ट है कि साधक को श्रेष्ठ मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए।
२. मुण्डकोपनिषद् ३.१.६
सत्येन पन्था विततो देवयानः
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामाः।
भावार्थ —
सत्य का ही मार्ग देवयान (मोक्षमार्ग) के रूप में विस्तृत है, जिस पर चलकर ऋषि परम अवस्था को प्राप्त होते हैं।
यहाँ “सत्य-पन्था” ही मुक्ति का मार्ग कहा गया है।
३. बृहदारण्यकोपनिषद् १.३.२८
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥
भावार्थ —
हे प्रभो! हमें असत्य से सत्य की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें।
यह भी धर्ममार्ग से न भटकने की ही प्रार्थना है।
४. तैत्तिरीयोपनिषद् १.११.१
सत्यं वद। धर्मं चर।
भावार्थ —
सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो।
यह स्पष्ट निर्देश है कि जीवन धर्ममार्ग पर ही स्थापित रहे।
५. छान्दोग्योपनिषद् ७.१६.१
सत्यं हि एव जयते नानृतम्।
भावार्थ —
सत्य ही विजय प्राप्त करता है, असत्य नहीं।
सत्य-पथ ही स्थायी और विजयी मार्ग है।
६. श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.२३
यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥
भावार्थ —
जिस साधक की परमात्मा तथा गुरु में परम भक्ति होती है, उसी के लिए उपनिषदों के सत्यार्थ प्रकाशित होते हैं।
अर्थात् श्रद्धा और गुरु-मार्ग का अनुसरण ही सही मार्ग पर स्थिर रखता है।
७- महानारायण उपनिषद् ७८.१२ (पाठभेदानुसार)
ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि।
भावार्थ —
मैं ऋत (धर्म) का वचन कहूँगा, सत्य का ही आचरण करूँगा।
यह सत्य-पथ पर दृढ़ रहने का संकल्प है।
८. कैवल्योपनिषद् ३
न कर्मणा न प्रजया धनेन
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।
भावार्थ —
न कर्म, न संतान, न धन — केवल त्याग के द्वारा ही अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्त होता है।
यहाँ स्पष्ट है कि सांसारिक प्रेय मार्ग से हटकर त्याग और आत्मज्ञान का मार्ग अपनाना चाहिए।
९. प्रश्नोपनिषद् १.१०
तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया च।
भावार्थ —
तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या के द्वारा ही परम सत्य की प्राप्ति होती है।
यह अनुशासित साधना-पथ से विचलित न होने की शिक्षा है।
१०. मैत्रायणी उपनिषद् ६.३०
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ —
मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है।
यदि मन धर्ममार्ग पर स्थिर है तो मोक्ष, अन्यथा पतन।
सार--
इन उपनिषदों में यह सिद्ध होता है कि —
सत्य, ऋत और धर्म का मार्ग ही श्रेयस्कर है।
गुरु-भक्ति, त्याग, तप और श्रद्धा से साधक मार्ग पर स्थिर रहता है।
मन को संयमित कर धर्ममार्ग से विचलित न होना ही मोक्ष का साधन है।
पुराणों में‌ प्रमाण--
१. विष्णु पुराण-- ३.१२.४५
धर्मेण पापमपनुदति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
भावार्थ —
धर्म से पाप दूर होता है; धर्म की रक्षा करने पर वही धर्म हमारी रक्षा करता है।
इसलिए धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि धर्म का नाश हमें ही नष्ट कर दे।
यहाँ स्पष्ट निर्देश है कि धर्ममार्ग से विचलित न हों।
२. भागवत पुराण- १.२.६
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुकीऽप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥
भावार्थ —
मनुष्यों का परम धर्म वही है जिससे भगवान् में निष्काम और अखण्ड भक्ति उत्पन्न हो।
धर्म का सही मार्ग ही आत्मशान्ति और कल्याण देता है।
३. पद्म पुराण (उत्तरखण्ड)
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ —
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है; धर्म की रक्षा करने वाला धर्म से ही संरक्षित होता है।
धर्ममार्ग से विचलन विनाश का कारण है।
४. शिव पुराण (विद्येश्वरसंहिता)
सत्यं शिवं सुन्दरम्।
भावार्थ —
सत्य ही शिव (कल्याण) है और वही सुन्दर है।
सत्य-पथ ही शिवत्व (कल्याण) का मार्ग है।
५. मार्कण्डेय पुराण--
नास्ति धर्मात्परं नाथ सत्यं धर्मस्य लक्षणम्।
भावार्थ —
धर्म से बढ़कर कुछ नहीं है; सत्य ही धर्म का लक्षण है।
सत्य और भक्ति का मार्ग ही श्रेष्ठ है।
धर्म से विचलित होना पतन का कारण है।
६. अग्नि पुराण--
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।
भावार्थ —
जो मनुष्य धर्म से रहित है, वह पशु के समान है।
अर्थात् धर्ममार्ग का त्याग मनुष्यत्व का पतन है।
७. स्कन्द पुराण--
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ —
सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य न कहो; और प्रिय असत्य भी न कहो — यही सनातन धर्म है।
यह धर्ममार्ग पर संयमित आचरण का निर्देश है।
८. लिङ्ग पुराण--
धर्मो मूलं जगत्सर्वं धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ —
यह सम्पूर्ण जगत् धर्म पर आधारित है; सब कुछ धर्म में ही स्थित है।
धर्म ही जीवन और जगत् का आधार है।
९. ब्रह्मवैवर्त पुराण--
सत्यं परं धर्मः।
भावार्थ —
सत्य ही परम धर्म है।
सत्य-पथ ही सर्वोच्च आचरण है।
१०. नारद पुराण--
धर्ममार्गे स्थितो नित्यं न च्यवेत कदाचन।
भावार्थ —
मनुष्य को सदा धर्ममार्ग में स्थित रहना चाहिए, कभी उससे च्युत न हो।
यह सीधे-सीधे वेदभाव “मा प्रगाम पथो वयम्” की ही पुनरुक्ति है।
सार--
इन पुराणों में यह स्पष्ट है कि —
धर्म ही मनुष्यत्व का आधार है।
सत्य और संयम धर्म का मूल है।
धर्ममार्ग से विचलित होना पतन का कारण है।
भगवत् गीता में प्रमाण --
१. अध्याय १६, श्लोक २३
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
भावार्थ —
जो मनुष्य शास्त्र-विधि का त्याग करके मनमाने आचरण करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख और न परमगति।
स्पष्ट है कि शास्त्रमार्ग (धर्ममार्ग) से विचलन पतन का कारण है।
२. अध्याय ३, श्लोक ३५
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
भावार्थ —
अपने धर्म का पालन दोषयुक्त होने पर भी श्रेष्ठ है; दूसरे के धर्म का पालन भय उत्पन्न करता है।
अपने कर्तव्य-पथ पर स्थिर रहना ही कल्याणकारी है।
३. अध्याय ४, श्लोक ७–८
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
भावार्थ —
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेता हूँ।
धर्ममार्ग की रक्षा स्वयं भगवान् करते हैं।
४. अध्याय १८, श्लोक ६६
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
भावार्थ —
सब कर्तव्य-भ्रमों को छोड़कर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें पापों से मुक्त कर दूँगा।
यहाँ परम धर्म (ईश्वर-शरणागति) का मार्ग बताया गया है।
५. अध्याय २, श्लोक ४७
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
भावार्थ —
तुझे केवल कर्म करने का अधिकार है, फल की चिंता मत कर।
कर्तव्य-पथ पर स्थित रहना ही गीता का मूल संदेश है।
निष्कर्ष--
गीता का स्पष्ट संदेश है —
शास्त्र-विहित धर्ममार्ग का त्याग न करें। अपने स्वधर्म में स्थित रहें।
ईश्वर-शरणागति ही परम पथ है।
महाभारत में प्रमाण --
१. शान्ति पर्व--
धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
भावार्थ —
धर्म की रक्षा करने पर धर्म हमारी रक्षा करता है।
अतः धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि धर्म का नाश हमें ही नष्ट कर दे।
स्पष्ट शिक्षा — धर्ममार्ग से विचलन विनाश का कारण है।
२. वनपर्व--
न हि धर्मादपेतस्य लोकोऽस्ति सुखमेधितम्।
भावार्थ —
जो धर्म से विमुख हो जाता है, उसे इस लोक में स्थायी सुख प्राप्त नहीं होता।
धर्मत्याग से सुख का अभाव होता है।
३. उद्योगपर्व--
सत्यं हि परमं ब्रह्म सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः।
भावार्थ —
सत्य ही परम ब्रह्म है और धर्म सत्य में ही प्रतिष्ठित है।
सत्य-पथ ही धर्म का आधार है।
४. शान्ति पर्व--
एष धर्मः सनातनः।
भावार्थ —
यह सनातन धर्म है — अर्थात् शाश्वत आचरण-पथ।
सनातन धर्म का पालन ही श्रेष्ठ मार्ग है।
५. अनुशासन पर्व--
अहिंसा परमो धर्मः।
भावार्थ —
अहिंसा ही परम धर्म है।
धर्ममार्ग का मूल अहिंसा और करुणा है।
सार--
महाभारत का समग्र संदेश यही है -- धर्म की रक्षा करो, वही तुम्हारी रक्षा करेगा।
सत्य और अहिंसा धर्म का मूल हैं।
धर्म से विचलित होना पतन का कारण है।
स्मृतियों से प्रमाण --
१. मनुस्मृति ८.१५
धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
भावार्थ —
धर्म की रक्षा करने पर धर्म हमारी रक्षा करता है।
अतः धर्म का नाश नहीं करना चाहिए; धर्म का त्याग करने से वही हमें नष्ट कर देता है।
स्पष्ट शिक्षा — धर्ममार्ग से विचलन विनाशकारी है।
२. मनुस्मृति ४.१३८
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ —
सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य न कहो; और प्रिय असत्य भी न कहो — यही सनातन धर्म है।
सत्य और संयम धर्म का आधार हैं।
३. याज्ञवल्क्य स्मृति १.३
वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥
भावार्थ —
वेद सम्पूर्ण धर्म का मूल हैं; स्मृति, सदाचार और आत्मसन्तोष भी धर्म के आधार हैं।
वेदमार्ग से विचलित न होना ही धर्म की जड़ है।
४. नारद स्मृति
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ —
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है; धर्म की रक्षा करने वाला सुरक्षित रहता है।
धर्मत्याग का परिणाम पतन है।
५. पराशर स्मृति १.२४
श्रुतिस्मृत्योर्ममाज्ञायां यस्तां उल्लंघ्य वर्तते।
आज्ञाछेदी मम द्वेषी मद्भक्तोऽपि न वैष्णवः॥
भावार्थ —
जो मेरी आज्ञा रूप श्रुति और स्मृति का उल्लंघन करता है, वह आज्ञा-भंग करने वाला और मेरा विरोधी है, चाहे वह भक्त ही क्यों न कहलाए।
श्रुति-स्मृति के धर्ममार्ग से विचलन अनुचित है।
निष्कर्ष
स्मृति-ग्रन्थों में स्पष्ट कहा गया है —वेद ही धर्म का मूल हैं।
धर्म की रक्षा करना आवश्यक है।
सत्य, संयम और सदाचार धर्ममार्ग की नींव हैं।
श्रुति-स्मृति के मार्ग से विचलन पतन का कारण है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण --
१. चाणक्य नीति--
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।
भावार्थ —
जो मनुष्य धर्म से रहित है, वह पशु के समान है।
धर्ममार्ग का त्याग मनुष्यत्व का पतन है।
२. हितोपदेश--
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ —
सत्य और प्रिय वचन बोलो; अप्रिय सत्य तथा प्रिय असत्य से बचो — यही सनातन धर्म है।
सत्य और संयम धर्ममार्ग की आधारशिला हैं।
३. पंचतंत्र--
न धर्मात्परमं मित्रं न धर्मात्परमं बलम्।
भावार्थ —
धर्म से बढ़कर न कोई मित्र है, न कोई बल।
धर्म ही जीवन की वास्तविक शक्ति है।
४. विदुर नीति--
सत्यं हि परमं नास्ति धर्मः सत्ये प्रतिष्ठितः।
भावार्थ —
सत्य से बढ़कर कुछ नहीं; धर्म सत्य में ही प्रतिष्ठित है।
सत्य-पथ ही धर्म का आधार है।
५. शुक्रनीति-
धर्ममार्गे स्थितो नित्यं न च्यवेत कदाचन।
भावार्थ —
मनुष्य को सदैव धर्ममार्ग में स्थित रहना चाहिए और उससे कभी विचलित नहीं होना चाहिए।
सार--
नीति-ग्रन्थों में स्पष्ट शिक्षा दी गई है —
धर्म ही मनुष्य का वास्तविक बल और मित्र है। सत्य और संयम धर्म का मूल हैं। धर्ममार्ग से विचलित होना पतन का
योगवासिष्ठ से प्रमाण --
१. वैराग्य प्रकरण--
संसार एव दुःखानां मूलमित्यवधारय।
विवेकमार्गमास्थाय तरेद्भवसागरम्॥
भावार्थ —
यह संसार ही दुःखों का मूल है; अतः विवेक-मार्ग का आश्रय लेकर भवसागर को पार करो।
यहाँ “विवेक-मार्ग” से विचलित न होने की शिक्षा है।
२. मुमुक्षु प्रकरण--
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिः शान्तस्य कुतः सुखम्॥
(अर्थ-संदर्भ में उद्धृत)
भावार्थ —
जिसका मन संयमित नहीं, उसकी बुद्धि स्थिर नहीं होती; और अशान्त व्यक्ति को सुख नहीं मिलता।
मन को धर्ममार्ग में स्थिर रखना आवश्यक है।
३. उत्पत्ति प्रकरण--
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥
भावार्थ —
मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है; विषयासक्त मन बन्धन का कारण है और निर्विषय (विवेकयुक्त) मन मोक्ष का साधन है।
मन को सत्य-मार्ग में स्थिर रखना ही मुक्ति का पथ है।
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